शैल जीजी शान्तिकुन्ज(आध्यात्मिक)-301
मॉ नहीं पर मॉ जैसी वो,
सब उसको जीजी कहते हैं।
मॉ की सरल मूर्ति दिखती,
सब उसको देवी कहते हैं।
मॉ ने सत्ता जिसको सौंपी,
सब पर प्यार लुटाने की।
उसी प्यार की सत्ता को वह,
दोनों हाथ लुटाती है।
ऊपर से जो कर्कश दिखतीं,
भीतर से उतनी कोमल।
एक ऑख से प्यार जतातीं,
एक से भय दिखलाती हैं।
साधारण सी दिखने वाली,
विषम संख्य पीने वाली।
अन्दर ही अन्दर वह सबकी,
पीड़ा पीती जाती है।
शान्तिकुन्ज गर्भ है मॉ का,
इसकी वह रखवाली करती।
छोटे भाई - बहनों की वह,
हरदम है सेवा करती।
कोई न उसकी पीड़ा पूछे,
कोई न उसके मन की जाने।
सबका दर्द छिपाती दिल में,
मॉ का फ़र्ज निभाती है।
सब अपनी अपनी कहते हैं,
कुछ ना कुछ मॉगा करते हैं।
सबको देती रहती जो,
वह भी कुछ मॉगा करती है।
मॉ नहीं पर मॉ जैसी जो,
ऐसी जीजी से पूछो।
हे गुरुवर की प्यारी बिटिया,
हम क्या दे सकते तुमको।
............... 16/6/04
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