निश्छल बक-बक(व्यक्तिगत)-304
निश्छल बक.-बक, सरल हृदय
और प्यार का सागर थे दादा।
अनदेखी बड़बोली बहन के,
शुभचिंतक...... थे दादा।
तभी तो बहना की बीमारी सुन,
तड़प उठे मेरे दादा।
बार - बार हर बार ये जिद,
मेरी विद्या (शक्तिपात) को लेजा।
ना ले पाने पर पछतायेगी,
पास नहीं होंगे दादा।
छह दिन का यह प्यार लुटाकर,
कर्ज चुकाना बाकी था।
अन्दर की सब व्यथा बताना,
और झगड़नाबाकी था।
उम्र नहीं थी बचपन की,
पर मन तो बच्चों जैसा था।
बचपन में हम मिल ना पाये,
अब तो बचपन जैसा था।
प्यारे दादा वापस आओ
अब तो यही गुजारिश है।
दादा और मेरे रिश्ते में,
भगवन तेरी साजिश है।
मेरे दादा दूर नहीं हैं,
मेरे दिल में बसते हैं।
आप भी अपने दिल में झॉको,
क्या ही जोर से हॅसते हैं।
............ 15/1/08
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