तुम पूछते हो(आध्यात्मिक)-308
तुम पूछते हो मुझसे,
अच्छे से ये सवाल।
जिनका न मुझको आता,
कुछ अच्छा सा जवाब।
तुमने पूछा - - -?
आत्मा में रहती हो,
या शरीर पै अटकी हो--?
कैसे तुम्हें बताऊॅ तुम,
मुझसे ये क्या पूछते हो।
तुम आत्मा हो मेरी,
तभी तो पाक हो।
मैं शरीर हूॅ तभी तो,
ऐसी दागदार हूॅ।
तुम भी तो हो सयाने,
जो रहते हो घर के भीतर।
"मैं बाहर के छींटे सहकर,
कमजोर पड़ गयी हूॅ।
तुम चाहते हो जब भी,
घर ढूॅढ लेते अपना।
मरम्मत करा-कराकर
मैं टूट सी चुकी हूं।
तुम मुझमें कैद रहकर,
खुश ख़ूब हो रहे हो।
मैं मौत से सहमी हूॅ,
मर - मर के जी रही हूॅ।
क्यूॅ तुम नहीं बनाते,
मुझको भी अपने जैसा।
मैं तुमको देखकर भी,
क्यूॅ सॅभल नहीं रही हूॅ।
क्यूॅ पूछते हो मुझसे,
मैं कौन हूँ, मैं क्या हूॅ।
तुम रहते हो इसमें "मालिक",
बस इतना जानती हूँ।
- - - - - - - - - - 28 /7/11
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