तुम देखते हो हर पल(आध्यात्मिक)-315
तुम देखते हो हर पल,
मैं देख तुम्हें ना पाती।
बस यही फर्क है मुझमें,
तुम दीपक मैं बाती।
तुम रहते हो मेरे भीतर,
मैं बाहर ढूॅढती हूॅ।
तुम्हें देखने को हर पल,
ना जाने क्यूँ तरसती हूॅ।
तड़पन में ही कमी है,
जो दीखते नहीं हो।
वर्ना तो दिल में आज भी,
तुम समाये हुये हो।
ढूॅढती हूॅ हर पल,
ना जाने कहाँ - कहॉ पर।
कैसे तुम्हें मैं पाऊॅ,
फ़िर से इसी जहॉ पर।
कुछ तो बताओ दाता,
अब कैसे तुम मिलोगे।
मेरे मन को धीरज,
अब कैसे तुम धरोगे।
अब आ भी जाओ प्यारे,
अब तो दरश दिखा दो।
अपनी भटकती दासी को,
कुछ राह तो दिखा दो।
फ़िर न कहना मैंने,
तुम्हें नहीं पुकारा था।
दाता तुम्हारी याद ने,
कितना नहीं रुलाया था।
आ जाओ आ भी जाओ,
एक बार आ भी जाओ।
तिरछी सी मुस्कुराहट,
एक बार दिखा भी जाओ।
13/3/16
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