धन से मजबूर हूँ(आध्यात्मिक)-342

धन से मजबूर हूॅ, तन से लाचार,
फ़िर भी इस मन में कितना उत्साह।
दीपों के जलते ही प्रीतम पधारेंगे,
ऐसा ही मुझको है पूरा विश्वास।
उनके बिना न कोई उत्सव है मनता,
उनकी खुशी से ही जीवन है चलता।
प्यारे जब आयेंगे, खुशियाँ साथ लायेंगे।
चारों तरफ़ होगी उनकी जय - जयकार।
पेड़ - पौधे - पत्ते सभी तो मुस्करायेंगे,
जीव - जन्तु सारे कोलाहल मचायेंगे।
घर की दीवारें जब बोलेंगी मंत्र,
झनझना उठेंगे तब सारे ही यंत्र।
दाता के साथ होंगे लझ्मी गणेश जी,
और भी अनेक देवगणों की बारात भी।
 गुरूमाता दाता को तिलक लगायेंगी,
खुशी से झूम के मिठाइयां खिलायेंगी।
गुरुदेव प्रसन्न होंगे खुशी से झूमकर,
बेटी को उनकी रखा है सॅभालकर।
अपने ही घर में जब आयेंगे दाता,
बच्चों के बीच हॅसना उनको है भाता।
घर नहीं ये आश्रय है उनका बनाया,
गुरूदेव माताजी ने यहॉ सब-कुछ जुटाया।
सबकी शरण में, उनके चरणों में,
रहना है मुझको इतना क्यों भाता।
प्यार का भॅडार लिए, खुशियों का अॅबार लिये,
सब कुछ लुटाते यूॅ आयेंगे दाता।
दीपों का त्यौहार आज, अति उल्लास लिए,
घर के कण - कण में, खुशियों की बहार लिए।
सबके मनों में ताजगी का भाव लिए,
दीप जलायेंगे मेरे साथ मेरे ही दाता।

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