जप तप पूजा-पाठ(आध्यात्मिक)-314

जप - तप, पूजा - पाठ, व्रत - संयम,
आज हुये हैं सब बेकार।
मैं ना कुछ कर पाती गुरूवर,
तुम ही केवल हो आधार।
याद - याद केवल तुम आते,
ध्यान में तुम ना रहने पाते।
टिकने की आदत ना तुमको,
चट से आते, झट से जाते।
शायद मेरे जैसा कोई,
भक्त पड़ा हो कहीं बेहाल।
तभी तो दाता मेरे व्याकुल,
जानते वो अन्दर का हाल।
गुरूवर आपके चरणों में क्यूॅ,
भक्ति है कुछ अभी अधूरी।
तभी तो ये मन मारा फिरता,
होती कोई आस न पूरी।
चरणों में यूॅ शरण तो दी है,
कम नहीं है ये उपकार।
  फ़िर भी मन क्यूॅ बोझिल होता,
बोझा देता नहीं उतार।
हरण - भरण सब आप ही करते,
फ़िर भी मन में संशय भरते।
दूर तमाशा देखा करते,
ऐसे मेरे पालनहार।
 परम हितैषी मेरे दाता,
करते सबका बेड़ा पार।
फ़िर क्यूॅ विरह सताता मुझको,
रोने देता जारों-जार।
                               - - - - - - - - - - 6/2/09

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