आध्यात्म के चिकित्सक(आध्यात्मिक)-288

आथ्यात्म के चिकित्सक,
तुम वैसे भी चिकित्सक।
ये कौन जाने कबसे,
तुम सबके मनोचिकित्सक।
नड़ - नाड़ियों में सबकी
कैसा रूधिर है बहता।
तुमसे भला ये अच्छा,
और कौन जान सकता।
  मेरे रूधिर में दाता,
कचरा भरा है पूरा।
   सब पारदर्शी कर दो,
ये काम है अधूरा।
   मस्तिष्क में है मेरे,
ना जाने कितनी हलचल।
   सब नाड़ियॉ रुकी हैं,
सारा भरा है दलदल।
   कान और ऑखें,
कमजोर हो गये हैं।
   सुनता है ना ही दिखता,
सब मूढ़ हो गये हैं।
   जीभ तो हमारी,
विष उगलती सदा हैे।
   कॅठ में हमारे कुछ
ज़हर सा भरा है।
   फेफड़े तो गुरुवर,
जर्जर ही हो चुके हैं।
   दूषित ही वायु आती,
सब छींड़ हो चुके हैं।
   दिल (ह्रदय) में तो मेरे सारे
, ब्लाॅकेज हो गये हैं।
    बस सर्जरी है बाकी,
प्रेम फूटना है बाकी।
    धार प्रेम की बहा दो,
रसधार तार कर दो।
    सब नाड़ियों में मेरे,
बस प्रेम - प्रेम भर दो।
    --बस प्रेम - प्रेम भर दो।
                         - - - - - - - - - 25/1/09

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426