अपने इस जीवन में ऋण(सामाजिक)-277
अपने इस जीवन में ऋण, भी है कितनों का।
ब्रह्मांड में विचरण करते, प्यारे सब पितरों का।
अच्छा सा घर देखा, अच्छी सी मॉ।
मॉ की ही कोख में, वो नन्हीं सी जान।
सबके सहयोग से ही, कोख में पली।
धरती तक आने में, कितनों की ऋणी।
धरती पै आने तक, बूढ़ा हो जाने तक।
सबका सहारा मिला, सबका ही प्यार मिला।
फ़िर भी हम ढूॅढते रहे, अपनी ही दुनियॉ।
ना जाने कैसी अपने, सपनों की दुनियॉ।
अपने ही मन से, और अपने ही तन से।
जूझते रहे हम, पूरे ही जीवन से।
कर्जों के बोझ तले, जीवन है पलता।
देखे - अनदेखे ऋण से, जीवन है चलता।
फ़िर भी हम पालते हैं, सबसे आशायें।
बोलते हैं खरी - खोटी, कितनी ही भाषायें।
कर्म से ही बॅधना, कर्म को ही काटना।
कर्म के ही व्दारा बस, कर्म को ही जपना।
इस बॅधन से, इस क्रन्दन से।
"मूढ़मति "इस तन मन धन से,
ऋण को काटो, कर्म से बॉटो।
कर्म ही पूजा, कर्म ध्यान है,
बस इतना सा ब्रह्मग्यान है----?
बस - - - मेरा यह ब्रह्मग्यान है।
- - - - - - - 18/2/08
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