समर्थ प्रीतम की बेल त(आध्यात्मिक)-283

समर्थ प्रीतम की बेल तू,
लिपटत किन - किन ठौर।
वो बेला फ़िर आयेगी,
जब प्रीतम होंगे ठौर।
छोड़ कहीं ना जा सकते वो,
रहते इधर - उधर ही हैं।
तू जब तक ना प्यासी उनकी,
तब तक नज़र इधर ही हैं।
उनका प्यार और उनकी इज्जत,
रखना बड़ा सॅभाल के।
वही प्यार बस काम आयेगा,
इस जीवन सॅचार के।
तड़पत अॅखियां देखन तुमको,
तुम कैसे मुझको दीखोगे।
प्रीतम प्यारे आ जाओ,
बतलाओ तुम कब आओगे।
कैसे समझाऊॅ दिल की तड़पन,
क्या तुम समझ नहीं पाते।
ज़ार - ज़ार ये दिल रोता है,
तुम फिर से क्यूँ नहीं जाते।
कैसे भी आ जाओ प्यारे,
किसी रूप में दर्शन दो।
अपनी इस दासी को प्यारे,
आकर बॉहों में भर लो।
                               - - - - - - - - 12/2/16

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