भावों का भूखा हूँ दाता(आध्यात्मिक)-281

भावों का भूखी हूॅ दाता,
भावों को तुम बहने देना।
भावों ने तुम्हें प्रीतम माना,
विश्वास को मत डिगने देना।
मिल जाता सब कुछ दुनियॉ में,
बस प्यार कहीं ना मिलता है।
वो प्यार का सागर तुम दाता,
डुबकी इसमें लगने देना।
तुम मेरे हो, तुम साईं हो,
सेवक को अपनाकर रखना।
मैं शरण तुम्हारी आयी हूॅ,
थक हार चुकी हूॅ दुनियॉ से।
कदमों में तेरे रख दी दुनियॉ,
मेरी दुनियॉ तुम ही रहना।
बस एक भरोसा तुम मेरा,
तुम ही मेरे बस मेरे हो।
ये भाव प्रबल करना दाता,
ये भाव न तुम मिटने देना।
भावों का खेल निराला है,
तुम क्या - क्या खेल दिखाते हो।
भावों के धरातल से उठकर,
कभी इधर भी दर्शन दे जाना।
                               - - - - - - - 6/2/12

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