भेज रही हूँ तुम्हें निमंत्रण(आध्यात्मिक)-279

भेज रही हूॅ तुम्हें निमंत्रण,
दाता यग्य में आने का।
मन, वाणी और दिल में रहकर,
सब संचालन करने का।
-आप रहेंगे साथ यंत्रवत,
काम करेगी ये काया।
कुछ ना होगा पास फिरेगी,
साथ - साथ फिर भी माया।
-ऐसा ही विश्वास आज फिर,
ऐसा ही आभास मुझे।
दाता गुरुवर कृपा करेंगे,
शरण रखेंगे सभी मुझे।
-मैं - मैं मेरी आप मिटा दो,
श्वासों में बस मंत्र चला दो।
चारों तरफ हर दिशा छेत्र में,
बस अपनी खुशबू फैला दो।
चरणों में बस रहे समर्पण,
दिल में तुम्हारा ध्यान रहे।
ऑखों से अश्रु हैं बहते,
प्यारी सूरत साथ रहे।
अपने पास रिमोट है रखना,
इस काया को खेने का।
गड़बड़ ना होने पाये,
गुरुवर की पाती पढ़ने में।
अनगढ़ - अनपढ़ ये जीवन है,
फ़िर भी जाने कैसा मन है।
चाहत बेल अमर बनने की,
दाता से पोषण पाने की।
आप ही देखें, आप ही बूझें,
विष की बेल न बनने देना।
केवल - केवल - केवल दाता,
अपनी शरण में रहने देना।
                                      - - - - 2/4/08

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