दाता मेरे रूप की चौदस(आध्यात्मिक)-284
दाता मेरे रूप की चौदस,
चौदस रूप की मेरे दाता।
रूप निराला उनका क्या है,
चौदस भी शर्माती दाता।
ऑखें जब बोला करती हैं,
रूप निखरकर अलग ही आता।
मन - मन वो मुस्काते है जब,
रूप बेचारा छुप - छुप जाता।
रूप में वो हैं, वो ही रूप हैं,
रूप भला ये समझ न पाता।
रूप अकड़कर समझ ये बैठा,
मुझसे ही सब सुन्दर दिखता।
दिखता हो वो सुन्दर ही हो,
रूप की ऐसी बात नहीं।
भीतर - बाहर जो सुन्दर हो,
रूप की ये सौगात नई।
दाता ही पर्याय रूप का,
रूप भला ये क्या जाने।
चारों ओर से रूप है झरता,
चौदस ये कैसे माने।
- - - - - - - 27/10/08
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