अजब सा खौफ़(आध्यात्मिक)-295
अजब सा ख़ौफ उनकी
ऑखों से बयॉ होते देखा।
मुस्कुराती चिलमन को
खामोश दरख्त सा देखा।
अपना बनाकर लूटा है
चमन को जिसने।
उसी के दरम्यान लोगों को
दहशत से गुजरते देखा।
-तुझे क्या मालूम..?
खु़दा कब तक साथ देगा तेरा।
डोर को ढील भी वो
जानकर दे देता है।
मुस्कुराता भीतर वो,
बाहर बुत बना बैठा है।
तुम्हारे ख़ौफ़ से वो भी,
तो ग़मज़दा बैठा है।
-देहली भी उसकी,
दरवाजा भी उसका।
सॉकल का सिरा,
तुम्हारे हाथ में दे रखा है।
बन्दे भी उसके,
बुलाता है जिन्हें,
अलहक की सदा देकर,
-तुम उन्हें क्यों रोकते हो आने से,
जिनके दिल में हर वक्त वो समाता है।
कहॉ तक दौड़ोगे, भगाओगे सबको,
तुम क्या जानो - - - - -?
ये दर्द उसको भी कितना सताता है।
22/7/11
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