रोम-रोम में भर दो मेरे(आध्यात्मिक)-293

रोम - रोम में भर दो मेरे,
दाता रंग गुलाल।
नशा आपका चाल आपकी,
कुछ ऐसा मेरा हाल।
अॅग - अॅग में मस्ती भर दो,
अपने जैसी चुस्ती भर दो।
भीतर - बाहर अपने रंग में,
रंग दो मुझको आज।
गहरा इतना रंग भर देना,
धुल-धुलकर भी ना झूटे।
छककर आज पिला दो इतना,
नशा कभी ये ना टूटे।
रंग के तेरी ओढ़ चुनरिया,
जब मैं बाहर आऊॅगी।
देख के जग यूॅ करे हॅसाई,
मैं पागल कहलाऊॅगी।
तेरे ही रंग में मुझको रंगना,
तेरे नशे में पागल होना।
होली पर ये सब कुछ दे दो,
पड़ी रहूॅ मैं तेरे अॅगना।
तेरा नशा और तेरी इबादत,
मुझको इतनी भाती है।
जैसे पिय की ओढ़ चुनरिया,
पिय के संग शरमाती है।
होली की मस्ती भर दे दो,
अपना सारा रंग - ढंग दे दो।
चारों तरफ रंग तेरा बरसे,
ऐसा नशा कुछ मुझको दे दो।
                                - - - - - - - - - 7/3/09

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