अमृतवाणी-136/137/138

अमृतवाणी
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इस विषम समय में मेरी आप लोगों से, प्रत्येक से यही प्रार्थना है कि आप अपने समय का थोड़ा अंश निकालें ।हमने कितनी बार कहा व छापा है कि आप समयदान कीजिए।चन्द्रमा पर ग्रहण जब पड़ता है तब कितने ही लोग आते हैं व पुकार करते हैं कि चन्द्रमा पर ग्रहण पड़ा है, पुण्य कमाना हो तो दान करो। इस खराब समय में हमारी भी एक रट है-महाकाल की भी एक ही पुकार है-आप समय दीजिए,समय ख़र्च कीजिए।किस काम के लिए  ?आप इस काम के लिए समय लगाईये जिससे आप लोगों के दिमागों और विचारों को ठीक कर सकें।इनसान के अन्दर क्या है  ?  वस्तुतः न हाड़ है, न मॉस है, न मिट्टी, न पखाना, जो भी कुछ काम की चीज है, वह है विचार। विचार अग़र मनुष्य के पास हों तो ,आज अग़र विचारशीलता और दूरदर्शी विवेकशीलता लोगों के अन्दर आ गई होती तो दुनिया खुशहाल होती। इनसान, इनसान न रहकर देवता हो गया होता और जमीन का वातावरण स्वर्ग जैसा होता।पर विचारशीलता है कहॉं  ? समझदारी है कहॉं  ? अगर समझदारी बढ़ेगी तो आदमी के अन्दर ईमानदारी बढ़ेगी, ईमानदारी बढ़ेगी तो आदमी में जिम्मेदारी आयेगी और जिम्मेदारी आयेगी तो बहादुरी आयेगी।चारों चीजें एक साथ जुड़ी हुई हैं ।

                                     परमपूज्य गुरुदेव
                            (पण्डित श्रीराम आचार्य)
हमको लोगों की समझदारी बढ़ाने के लिए जी-जान से कोशिश करनी चाहिए।प्राचीनकाल के ब्राह्मण और सन्त यही काम करते थे।वे अपना गुजारा कम में करते थे व जीवन का उद्देश्य यही रहता था कि लोगों की समझदारी बढ़ायें।आप लोगों से भी मेरी यही प्रार्थना है कि लोगों की समझदारी बढ़ाने के लिए अपने समय का जितना अंश आप लगा सकते हो, लगायें। दिमाग में से आप ये ख़याल निकाल पायें तो बड़ा अच्छा हो कि बहुत-सा पैसा इकट्ठा होना चाहिये।पैसा रहेगा नहीं।मैं एक बात आपको बताये देता हूँ। अगले दिनों समाज की ऐसी व्यवस्था बनने वाली है, जिससे कि धन व्यक्तिगत नहीं रह जायेगा। सच्चा अध्यात्मवाद आपको मालदार नहीं बनने देगा।चौबीसों घंटे आपका दिमाग व शक्तियॉ मालदार बनने की ख्वाहिश में लगते हैं तो आप ग़लती पर हैं, आप ठीक कीजिए अपने आपको। अपना गुजारा सामान्य मनुष्य जिस तरीके से करते हैं, आप भी उसी तरीके से गुजारा करना सीखिये।फ़िर आप देखेंगे कि आपके पास समय, श्रम,बुद्धि, क्षमतायें कितनी ही चीजें बच जाती हैं,जो समाज के काम लगाई जा सकती हैं।जरूरी नहीं कि आप अपना मकान छोड़कर बाहर चले जायें।आप अपने घर रहकर भी बहुत काम कर सकते हैं, जिससे आपका क्षेत्र, आपका गॉव, आपके समीपवर्ती वातावरण में जाने कैसी हवा पैदा हो सकती है।कमाल हो सकता है तो इसके लिए क्या करना पड़ेगा  ? इसके लिए मेरे ख़याल से आपको एक ट्रेनिंग लेनी चाहिए, छोटी से छोटी चीजों के लिए ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है।

                               परमपूज्य गुरुदेव
                      (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
ट्रेनिंग बड़ी आवश्यक है।विश्वामित्र राम व लक्ष्मण को उनके पिता से मॉगकर ले गये थे और उनको ट्रेनिंग दी थी, काहे की ट्रेनिंग दी थी।बड़ी महत्वपूर्ण ट्रेनिंग दी थी।शिवजी का इतना भारी धनुष तोड़ा जाये  ? लंका में जो राक्षस रहते हैं, उनको किस तरीके से समाप्त किया जाये  ? ये सारी बातें विश्वामित्र के आश्रम में जाकर सीखी थी।ऐसी ही एक ट्रेनिंग की व्यवस्था हमने अपने शॉतिकुंज में की है,ताकि आप समाज में छाई असुरता से लड़ सकें।शॉतिकुंज को पहले से भी हमारा तीस गुना करने का मन था, किन्तु अब बहुत दिनों से नालन्दा और तक्षशिला वगैरह,यही हमारे दिमाग में घूमते रहते हैं।हमें यही सपना आता रहता है कि नालन्दा, जिसमें हजारों धर्म-प्रचारक तैयार किये गये थे, यहाँ पर बने।धर्म का नाम तो मैं अब नहीं लूँगा।यह नाम बहुत बदनाम हो गया है।मैं समाज-सेवा की बात आपसे कहूँगा।यह कहूँगा कि आपकी महानता की वृद्धि के लिए सेवा बेहद आवश्यक है और जब तक आप समाज की सेवा नहीं करेंगे,तब तक आप  उन्नतिशील नहीं बनेंगे  ? आपकी आत्मा में सन्तोष और शांति का निवास नहीं होगा।

                                 परमपूज्य गुरुदेव
                        (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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