गुरुगीता-7
राबिया अक्सर इबाबत करते – करते सो जाया करती थी । एक दिन भी इसी तरह राबिया सो गई । तभी एक चोर आया और राबिया की चादर लेकर भागने लगा । लेकिन उसे बाहर जाने का रास्ता दिखाई नहीं दिया । तीन – चार बार दीवार से टकराने के बाद उसने चादर एक जगह रखकर इत्मिनान से सोचना शुरू किया, तभी उसे रास्ता दिखाई दिया लेकिन जैसे ही चादर लेकर मुड़ा, फिर से अँधेरा छा गया ।
इस तरह उसने कई बार कोशिश की किन्तु हर बार जैसे ही वह चादर लेकर भागता, आँखों के आगे अँधेरा छा जाता । आखिर वो नहीं माना तब गूंज के साथ एक आवाज आई – “ क्यों आफत मोल ले रहा है !, खुशामद चाहता है तो हिफाजत से चादर रख दे । इस चादरवाली ने खुद को खुदा के हवाले कर रखा है । इसलिए शैतान भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता तो किसी और की क्या मजाल, जो इसका कुछ बिगाड़ सके ।” यह सुनते ही वह चोर चादर को हिफाजत से रखकर भाग गया ।
गुरुगीता पाठ
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वेदशास्त्र पुराणानि कृत्वा वै गुरुकाम्यया ।
स्वयं लोकगुरु: साक्षाज्जायते वेदतत्ववित् ।।9।।
अन्वयः-
गुरु काम्यया- गूरु की इच्छा से, वेदशास्त्रपुराणानि- वेदशास्त्र पुराण आदि, वैकृत्वा- प्रणयन करके, स्वयं-स्वयं,
साक्षात- साक्षात, वेदतत्ववित् - वेदों का तत्व जानने वाले,
लोकगुरु: - लोक गुरु, जायते- होते हैं ।।9।।
अर्थ-
श्री गुरुदेव की इच्छाओं से वेदपुराण शास्त्रादि प्रणयन और
प्रकाश करके स्वयं साक्षात वेदतत्ववेत्ता लोकगुरु हो जाते हैं ।।9।।
According to tha desire of the Supreme
Master those who become well versed in
Vedas, Puranas and other scriptures appear in this world as Master. They develop deep insight in the knowledge of
Vedas and other scriptures.
COMMENTS:
Tha desire of the Master is all powerful for everything. He can bestow knowledge
to an illiterate, ignorant person and appoint him for tha benediction of the world.
👣🙏
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