गुरुगीता-28

आप अपने महबूब के लिए सारी दुनिया छोड़ सकते हैं/ उसके लिए अपनी जान दे सकते हैं/ शायद नहीं, पर सूफी संतों की यह पुरानी परंपरा है। इसे वे ‘फना’ कहते हैं। फना यानी अपने प्रेमी के लिए मर जाना। सूफियों का महबूब गुरु या खुदा होता है। सो उनके लिए मरना खुशी की बात होती है। पर ये मरना केवल दुनियावी मृत्यु नहीं, मात्र शरीर का मरना नहीं होता। सूफी मत के संदर्भ में फना या मौत का अर्थ है अपने नफ्स को मारना। यह एक रूहानी मृत्यु है जिसकी कई मंजिलें हैं। नफ्स को मारने का अर्थ है, पहले अपने अस्तित्व या अहंकार को मारना। दूसरा, अपनी काम वासना को मारना और सच्चा प्यार करना। मोहब्बत सिर्फ काम वासना नहीं। तीसरा, खुदा के लिए अपनी रूह या प्राणवायु का त्याग करना। इस को सूफी ‘विसाल’ कहते हैं जो उर्स के नाम से मनाया जाता है। किसी सूफी की जब मृत्यु हो जाती है तो उसे विसाल कहते हैं। विसाल का अर्थ है प्रेमी और प्रेमिका का मिलन या मेल अर्थात आत्मा और परमात्मा का मिलना।
उर्स के मौके पर सूफी जश्न मनाते हैं। कव्वाली ‘रंग’ पर खत्म होती है – ‘आज रंग है ऐ मां रंग हैं री, मोरे महबूब के घर रंग है री। सजन मिलावरा इस आंगन में, उस आंगन में। मैं पीर पायो निजामुद्दीन औलिया। गंजे शकर मोरे संग है री। मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखी सखी री। तोरा रंग मोरे मन भाया निजामुद्दीन। वो तो जहां देखों मोरे संग है री।’
इनमें दुनियावी इश्क के माध्यम से रूहानी या आध्यात्मिक इश्क की बातें समझाई गई हैं। सूफियों की विशेषता है कि वे मौत से भी मोहब्बत और जश्न का पैगाम देते हैं। इन सूफी संतों से सीखना चाहिए कि इंसान के कल्ब या दिल को दूसरों को मारने में सुकून नहीं मिलता। खुदा या परमात्मा के लिए खुद मर-मिट जाने में असली आनंद है।
     स्वामी राम के अनुसार आगरा के एक छोटे से दरगाह में एक सूफ़ी सन्त दिगम्बर वेष में रहा करतीं थीं।उनकी आयु उस समय लगभग 93 वर्ष थी।जिन्हें बीबीजी कहकर सभी बुलाते थे।
वे कहा करती थीं कि सांसारिक जनों ने सीखा है कि मिट्टी के पात्र को अन्न और रुपयों से कैसे भरा जाता है, किन्तु लोगों ने यह नहीं जाना कि हृदय के पात्र को कैसे भरा जाता है ?
एक रात्रि बीबी जी ने कहा कि बेटा!ईश्वर से मिलना बहुत सरल है।मैंने पूछा, 'बीबीजी, वह कैसे ' ? वह बोलीं, 'अग़र परमात्मा से मिलना हो,परमात्मा में मिल जाना हो तो पहले तुम इस भौतिक जगत से नाता तोड़ लो।भौतिक जगत से नाता तोड़ के अपने प्रियतम के साथ सम्बन्ध स्थापित कर लो।यहां से नाता तोड़ और और वहॉ से नाता जोड़।और यह अत्यंत सरल है।अपनी आत्मा को परमात्मा के चरणों में अर्पित कर दो, और फ़िर कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता है'।मैंने कहा, 'बीबीजी!लेकिन यह कैसे
संभव है ' ? उन्होंने अन्तर्वार्ता की शैली में जो कुछ भी कहा
उसका मैं यथावत् वर्णन कर रहा हूँ।
वह बोलीं, 'मैं अपने प्रियतम को देखने गई'।उन्होंने पूँछा, 'मेरे मन्दिर के द्वार पर कौन खड़ा है '।
मैं बोली,'आपकी प्रेमिका प्रभो'।
वे बोले, 'तुम्हारे पास प्रमाण क्या है कि तुम मेरी प्रेमिका हो'।
मैने कहा, 'यह है हथेलियों पर मेरा हृदय और ऑखों में ऑसू '।
तब मेरे प्रभु बोले, 'मैं तुम्हारा उपहार स्वीकार करता हूँ, क्यों कि मैं भी तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ।तुम्हारा सब कुछ मेरा हो गया। जाओ,और दरगाह में निवास करो '।
तभी से बेटे मैं यहॉ रहती हूँ यहाँ रहते हुये दिन रात उनकी प्रतीक्षा करती रहती हूँ और अनन्त काल तक प्रतीक्षा करती रहूँगी।
उन्होंने कहा कि-जीवन रूपी वृक्ष में दो दिव्य अमर फल लगे हैं।वे दो अमर फल हैं अविनाशी ईश्वर का चिन्तन तथा सन्तों का सत्संग।

गुरुगीता पाठ
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सर्वश्रुतिशिरोरत्नं विराजित पदांबुजम्।
वेदांतांबुजसूर्याय तस्मै श्री गुरवे नम:।।30।।
अर्थ
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वेदसमुदाय के शिरोमणि, उपनिषद समूह द्वारा जिनका चरण कमल सुशोभित हुआ है जो वेदान्तरूप कमल के दिनकर हैं, उन श्री गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ ।।30।।
30.
The one whose lotus feet are bedecked with gems of Upnishadas the highly esteemed sum and substance of Vedas and is like sun for the lotus of Vedanta, I offer my Salutation to that Master.
                                👣🙏

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