अमृतवाणी-127/128/129

अमृतवाणी
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शंकर जी का विवाह हुआ तो लोगों ने कहा कि किसी बड़े
आदमी को बुलाओ, देवताओं को बुलाओ।उन्होंने कहा नहीं, हमारी बारात में तो भूत-पलीत ही  जायेंगे।रामायण में
छंद है-'तनु क्षीन कोउ अति पीत पावन कोउ अपावन तनु धरे ।' शंकर की ने भूत-पलीतों का,पिछड़ों का भी ध्यान रखा और अपनी बारात में ले गये।आपको भी इनको साथ साथ लेकर चलना है।शंकर जी के भक्तों  ! अगर आप इन्हें साथ लेकर चल नहीं सकते तो फिर आपको सोचने में मुश्किल पड़ेगी, समस्याओं का सामना करना पड़ेगा और ।फिर जिस आनन्द में और जिस खुशहाली में शंकर के भक्त
रहते हैं, आप रह नहीं पायेंगे।जिन शंकर जी के चरणों में आप बैठे हुये हैं, उनसे क्या कुछ सीखेंगे नहीं  ? पूजा ही करते रहेंगे आप  ? यह सब चीजें सीखने के लिए ही हैं ।भगवान को कोई खास पूजा की आवश्यकता नहीं पड़ती ।

                                परमपूज्य गुरुदेव
                         (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

शंकर  भगवान की सवारी क्या थी  ? बैल ।वह बैल पर सवार होते हैं ।बैल उसे कहते हैं, जो मेहनत कश होता है,
परिश्रमी होता है ।जिस आदमी को मेहनत करनी आती है वह चाहे भारत में हो,इंग्लैण्ड, फ्रांस या कहीं का भी रहने वाला क्यों न हो-वह भगवान की सवारी बन सकता है ।भगवान सिर्फ़ उनकी सहायता किया करते हैं जो अपनी सहायता आप करते हैं ।बैल हमारे यहाँ शक्ति का प्रतीक है,
हिम्मत का प्रतीक है ।आपको हिम्मत से काम लेना पड़ेगा और अपनी मेहनत तथा पसीने के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा, अपनी अक्ल के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा, आपके उन्नति के द्वार और कोई नहीं खोल सकता, स्वयं खोलना होगा ।भैंसे के ऊपर कौन सवार होता है - देखा आपने शनीचर ।भैंसा वह होता है जो काम करने से जी चुराता है ।
बैल हमेशा से शंकर जी का बड़ा प्यारा रहा है । वह उस पर सवार रहे हैं, उसको पुचकारते हैं, खिलाते-पिलाते, नहलाते-धुलाते और अच्छा रखते हैं ।हमको और आपको
बैल बनना चाहिये, यह शंकर जी की शिक्षा है ।

                                   परमपूज्य गुरुदेव
                           (पण्डित श्रीराम आचार्य)

भगवान शंकर मरघट में निवास करते हैं।मरघट में क्यों करते हैं  ? इसका मतलब कि हमें ज़िन्दगी के साथ मौत को भी याद रखना पड़ेगा।सब चीजें याद, पर मौत को हम भूल गये।अपना फ़ायदा, नुकसान, जवानी, खाना-पीना सब कुछ याद है, पर मौत ज़रा भी याद नहीं है  ? मौत की बात भी अग़र याद रही होती तो हमारे काम करने और सोचने के तरीके कुछ अलग तरह के रहे होते।वे ऐसे न होते जैसे कि इस समय आपके हैं।अग़र यह ख़्याल बना रहे कि आज हम ज़िन्दा हैं पर कल हमें मरना ही पड़ेगा, आज मरे हैं, पर कल ज़िन्दा रहना ही पड़ेगा तो यह स्मृति सदा बनी रहती कि हमको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। हमारे लिए मरघट और घर दोनों एक ही होने चाहिए  ? समझना चाहिए कि आज का घर कल मरघट होने वाला है। आज की ज़िन्दगी कल मौत में बदलने वाली है तो कल की मौत नई ज़िन्दगी में बदलने वाली है।मौत और ज़िन्दगी रात और दिन के तरीके से खेल है, फिर मरने के लिए डरने से क्या फायदा  ? यह नसीहतें हैं जो शंकर भगवान मरघट में रहकर हमको सिखाते हैं ।

                                      परमपूज्य गुरुदेव
                               (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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