गुरुगीता-4
कॉची नरेश की राजकुमारी प्रेत बाधा से पीड़ित हुई ।
भूत नहीं ब्रह्म राक्षस था।तब श्री रामानुजाचार्य बुलाये गये ।उन्होंने वहॉ जाकर पूछा-"आपको ये योनि क्यों कर मिली ।" रोकर ब्रह्म राक्षस बोला-"मैं विद्वान था,किन्तु मैंने अपनी विद्या छिपा रखी ।किसी को भी मैंने दान नहीं किया, इससे ब्रह्म राक्षस हुआ ।आप समर्थ हैं, मुझे इस प्रेतत्व से मुक्ति दिलाइये ।" श्री रामानुजाचार्य जी ने राजकुमारी के मस्तक पर हाथ रखकर जैसे ही भगवान का स्मरण किया, वैसे ही ब्रह्म राक्षस ने उसे छोड़ दिया, क्यों कि वह स्वयं प्रेतयोनि से मुक्त हो गया ।उस दिन से रामानुज ने प्रतिज्ञा की कि वह स्वाध्याय का लाभ अपने समाज को भी देते रहेंगे ।
गुरुगीता पाठ
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यस्य देवि पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरो ।
तस्यैते कथिता ह्यर्था:,प्रकाश्यन्ते महात्मभि:।
मम रूपासि देवि त्वं त्वत्प्रीत्यर्थं वदाम्यहम् ।।5।।
अन्वयः-
यस्य-जिसकी, देवे-देवता में, पराभक्ति:-परमभक्ति है, यथा-जिस प्रकार, देवे-ईष्ट देव में, तथा-उसी प्रकार, गुरौ-
गुरु में, तस्य-उसके, हि-निकट, महात्मभि:-महात्मागण, एते-ये सब, कथिता-कहे गये, अर्था:-विषय, प्रकाश्यन्ते-
प्रकाश करते हैं, देवि-हे देवि, त्वम्-तुम्हारी, प्रीत्यर्थ-प्रसन्नता
के लिए, अहम्- मैं, वदामि- कहता हूँ ।।5।।
अर्थ -
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श्री शंकर बोले-देवता में जिनकी अचल भक्ति है और जिस प्रकार इष्ट देवता में भी भक्ति है उसी प्रकार की भक्ति गुरु में
है, उन्हीं के निकट महात्मागण आपके पूछे गये विषय का
प्रकाश करते हैं ।देवि तुम मेरा ही स्वरूप हो, इस कारण,
तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैं कहता हूँ ।
5-
Lord Shiva spoke-"those who have unflinching faith in deity-Devata and have same devotion towards tha Master
and desire to know this subject, tha saints
unfold this desired subject unto them only. Oh' Devi you are verily my form consequently for your happiness I narrate it .
👣🙏
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