गुरुगीता-26
देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं। महाभारत के आदि पर्व के अनुसार बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं। ये अपने ज्ञान से देवताओं को उनका यज्ञ भाग या हवि प्राप्त कराते हैं। असुर एवं दैत्य यज्ञ में विघ्न डालकर देवताओं को क्षीण कर हराने का प्रयास करते रहते हैं। देवगुरु बृहस्पति रक्षोघ्र मंत्रों का प्रयोग कर देवताओं का पोषण एवं रक्षण करते हैं तथा दैत्यों से देवताओं की रक्षा करते हैं।
धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार देवराज इंद्र किसी कारणवश स्वर्ग छोड़ कर चले गए। उनके स्थान पर राजा नहुष को स्वर्ग का आधिपत्य सौंपा गया। स्वर्ग का अधिपति बनते ही नहुष के मन में पाप आ गया और उसने इंद्र की पत्नी शची पर भी अधिकार करना चाहा।
यह बात शची ने देवगुरु बृहस्पति को बताई। देवगुरु बृहस्पति ने शची से कहा कि तुम नहुष से कहना कि यदि वह सप्तऋषियों द्वारा उठाई गई पालकी में बैठकर आएगा, तभी तुम उसे अपना स्वामी मानोगी। शची ने यह बात नहुष से कह दी। नहुष ने ऐसा ही किया।
सप्तऋषि जब पालकी उठाकर चल रहे थे, तभी नहुष ने एक ऋषि को लात मार दी। क्रोधित होकर अगस्त्य ऋषि ने उसे उसी समय स्वर्ग से गिरने का श्राप दे दिया। इस प्रकार देवगुरु बृहस्पति की सलाह से शची का पतिव्रत धर्म बना रहा।
गुरुगीता पाठ
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स्थावरं जंगमं चैव तथा चैव चराचरम् ।
व्याप्तं येन जगत् सर्वं तस्मै श्री गुरवे नम:।।28।।
अर्थ
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जो पर्वत और प्राणी समूह चर एवं अचर सारे संसार में व्याप्त होकर स्थित हैं उन श्री गुरुदेव को मैं प्रणाम
करता हूँ ।।28।।
28.
I offer my Salutation to that Master who pervades all animate,inanimate, movables
and immovables constituting the whole
universe.
👣🙏
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