सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-18
चण्डीगढ से आये पति-पत्नी बेहद ख़ुश हुये, कहने लगे बहन जी पण्डित तो बहुत रुपये लेते हैं, इन बच्चों ने तो कमाल ही कर दिया।इसके बाद अधीक्षक महोदय से मिलवाया तथा उनको बताया कि अनुष्ठान करने वाले बच्चों ने कुछ भी लेने से इनकार कर दिया।आफ़ताब ने पेन्ट लाने के लिए आपसे पूछकर दे जाने को कहा है ताकि जेल के अन्दर की दीवारों पर सदवाक्य लेखन कर सकें।उन्होंने खुश होकर तुरंत ही इज़ाजत दे दी। दूसरे ही दिन वे लोग पेन्ट,ब्रश, और भी पेन्टिंग से संबधित सामान जो लिखकर दिया था, वे लोग आकर देकर गये।आफ़ताब तक जब ये सामान पहुँचा तो देखते ही छोटे बच्चों की तरह उछलने लगा। अब उसे अपनी खुशी का काम जो मिल गया था ।धीरे-धीरे उसने काफ़ी स्थानों पर गुरुदेव के वाड्मय में से सदवाक्य लेकर लिखना शुरू कर दिया।
अभी वह पहले से भी ज्यादा व्यस्त हो गया,साथी लोग उसका खाना लेकर रख लेते और वो दीवार लेखन में ही
लगा रहता।बाद में सभी भाई बुलाकर लाते, तब कहीं खाना खाता।चारों तरफ़ दीवारें सदवाक्यों से भर दी थीं, जेल परिसर में घुसने के बाद लगता था कि जैसे किसी मन्दिर या किसी आश्रम में आ गये हों। सचमुच उस बच्चे ने अपनी मेहनत से कायाकल्प कर दिया था।प्रशासन भी बहुत ख़ुश था, उसमें इतना बड़ा परिवर्तन देखकर।अधीक्षक महोदय ने एक दिन यज्ञ के बाद उसके काम की प्रशंसा करते हुये उसे ड्रामा हॉल में महापुरुषों के चित्रों को बनाने का आदेश दिया।वह तो बहुत खुश हो गया क्यों कि उसके लिए यह काम किसी इनाम से कम नहीं था। उसके लिए तो यह काम बहुत बड़ा इनाम था। इस तरह एक नये काम की नई शुरुआत गुरुदेव ने उन सभी से तप कराकर बदले में उनकी
इच्छानुसार पेन्ट का सामान दिलाकर करा दी।मैंने कभी पढ़ा था कि जब एक बार अकाल पड़ा था, तो श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी(गुरुगीता प्रेस गोरखपुर) ने सबके लिये अनाज के भंडार खोल दिये थे ,लेकिन अनाज ले जाने की पहली शर्त थी कि पहले कम से कम एक घन्टा रामनाम जप करके जाओ और फिर अनाज लेकर जाओ।जो जितने ज्यादा घन्टे जप करेगा उसे उसी हिसाब से तराजू से तौलकर अनाज दिया जाता था।
गुरुदेव ने भी हम सबके साथ उसी तरह सहयोग किया।किसी के आगे इस अच्छे काम के लिए भी हाथ नहीं फैलाने दिया और वहॉ की दीवारें भी सदवाक्यों से सज गईं।
क्रमशः!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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