सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-21

इस तरह नवरात्रि साधना पूर्ण हो गई,और हम सब जो अन्दर देखे थे, उन भाइयों की प्रार्थना में जुट गए।फॉसी के बाड़े पर जिन सिपाहियों की ड्यूटी लगी थी वे भी हमसे बोले, मैडम जी, बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप लोग।मौका मिलते ही हमने उनसे कहा कि एक अच्छा काम आप
भी कर दें,वे बोले बताइये ? हमने कहा कि अन्दर से यदि कोई भाई पैन,मंत्र लेखन की कापियां, या पढ़ने के लिए किताबें मॉगें,तो आप गायत्रीे साधकों (जो नियमित यज्ञ व जप कर रहे थे ऐसे बन्दी भाइयों को हम साधक के नाम से पुकारते थे) से लेकर उन तक पहुँचा दिया करें चूँकि प्रशासन की अनुमति थी इसलिए वे तैयार हो गये
और इस तरह जो एक बाड़ा गुरुदेव-माताजी के प्यार से वंचित था ,उन्हें भी मॉ-बाप मिल गये।उन लोगों ने भी अपनी बैरक में गुरुदेव-माताजी की फोटो लगा ली थी, ऐसा
सिपाहियों ने बताया।अगली बार जब हम पहुँचे तो बन्दी भाइयों ने बताया कि फॉसी के बाड़े से केशव ने कुछ कागज और स्केच पेन तथा प्रताप (बदले हुये नाम) ने मंत्र लेखन की कापियां और लाल रंग के पैन मॉगे थे, जो भिजवा दिये थे।हम लोग जब उनके बाड़े में गये थे तो उन्होंने स्केच पैन लाने को कहा था,तो बीच में जाकर हम प्रशासन को बताकर गायत्री साधकों को दे आये थे तथा कह भी आये थे कि उस बाड़े से पुलिस वाले उन भाइयों के लिये मंत्र लेखन, पैन, आदि जो भी सामान मॉगें तो दे देना।
उन भाइयों को ये एहसास तो हो ही चुका था कि अब कोई
रूहानी ताकत ही बचा सकती है, अत: पूरे मनोयोग से वे
मंत्र जप और लेखन कर रहे थे। पता नहीं क्यों हम लोगों में
भी ये विश्वास बढ़ता जा रहा था कि गुरुसत्ता जरूर इन सबकी सहायता करेगी तभी तो वहां तक हम लोग पहुँच सके।
ड्रामा हॉल में यज्ञ की तैयारी के साथ एक तुम्हीं आधार सदगुरू प्रार्थना व यज्ञ शुरू किया। पता नहीं क्यों इतने गीत मिशन के होने के बाद भी केवल "एक तुम्हीं आधार सदगुरू" ही गाने का मन करता और हम सभी इतने भावविभोर हो जाते कि दोनों ओर से अश्रुओं की अविरल धारा बह रही होती थी,वे लोग कई बार पूछ बैठते-दीदीजी हम तो यहाँ बन्द हैं इसलिये रोते हैं लेकिन आप गाते-गाते क्यों रोते हो।समझ नहीं आता कि क्या जवाब दूँ  ? सच तो यह है कि उस वक्त ऐसा महसूस होता था जैसे गुरुदेव सामने खड़े हैं और मुझे लग रहा है कि ये तमाम बन्दी भाई हमारे रिश्तेदार हैं और मेरी गिड़गिड़ाती हुई वाणी कि आप सब पर अपनी कृपा का वरदान दे ही दें,चाहे इन्होंने अपराध ही क्यों न किये हों। अति की भावुकता का परिणाम ही था यह अन्यथा समाज की व अपने परिवार कीनिगाहों में तो एक ही व्यंग्य बाण सुनने को मिलता-"अरे जेल भी कोई जाने की जगह है ?महिला को महिला की तरह रहना चाहिए, गुरुदेव का कार्य बाहर के समाज में भी किया जा सकता है" वरिष्ठ लोगों की बात न मानने का ख़ामियाजा "अनुशासनहीन"के तमगे से भुगतना पड़ा "।ये कौन समझाए ऐसे अनुशासित वरिष्ठों को,कि गुरुदेव ने पीड़ा और पतन निवारण का सूत्र दिया था और जीवन भरउन्होंने यही किया भी।गुरुदेव-माताजीसे कोई एक भी बन्दाबिना कुछ पाये नहीं जुड़ा वरन सच तो ये है कि बड़े-बड़े लोग भी उनके समक्ष याचक की मुद्रा में ही जाते थे। जेल में पीड़ा भी थी और  पतन निवारण का काम भी था या यूँ कहें कि हमें समाज के अनुशासन में जीने की आदत नहीं थी, या फिर हमारी नियति यही थी
                                'गुरुकॄपा केवलम्'
                            "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                       👣🙏

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