अमृतवाणी-64/65/66

अमृतवाणी
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ब्रह्माजी ने जब यह विश्व बनाया था तब विवेक-
शीलता,विचारशीलता रूपी उपहार जिस दिन मनुष्य
को दिया,वह आज का गायत्री जंयन्ती का ही दिन था।गंगा आज ही अवतरित हुई थी और गायत्री मन्त्र
के रूप में ज्ञान की गंगा आज के ही दिन अवतरित
हुई थी।गंगा का एक स्वरूप स्थूल और एक स्वरूप
सूक्ष्म है।गायत्री का एक स्वरूप स्थूल और एक स्वरूप सूक्ष्म है।
        गायत्री मंत्र,ज्ञान गंगा,जिसका आज जन्मदिन
है,का स्थूल रूप वह है जो हमारी कल्पना के अनुसार एक महिला है कोई,कहीं आसमान में रहती
है,हँस की सवारी करती है।हमारी आपकी स्थूल
कल्पना है कि वह देवी ख़ुशामद से प्रसन्न हो जाती है।लेकिन जो लाभ-महात्म्य बताया गया है,उसे यदि
ग्रहण करना हो तो आपको उसके सूक्ष्म अन्तरंग में
प्रवेश करना होगा जिसका नाम गायत्री है।

                          परमपूज्य गुरुदेव
                  (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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गायत्री का अंतरंग यह कहता है कि मनुष्य को लोकमंगल के लिये,उत्कृष्ट जीवन जीने के लिये और प्रभु समर्पित जीवन जीने के लिये कटिबध्द
होना चाहिये।यह प्रेरणा है गायत्री मंत्र की।मनुष्य को अपने लिये ही नहीं जीना चाहिये।वह भगवान का सहायक है।भगवान ने उससे अपेक्षा रखी है कि
वह उसकी दुनिया को सुन्दर बनाने की कोशिश करे।यह संकल्प धारण करे कि उसके पास जितना
समय,बुध्दि,श्रम ख़ुद को व अपने बच्चों को पालने
के अतिरिक्त बचेगा उसे भगवान के लिये,लोकमंगल
के लिये ख़र्च करेगा।

                             परमपूज्य गुरुदेव
                   (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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भगवान बुध्द,शंकराचार्य,गाँधी,लोकमान्य तिलक जब लोकमंगल के लिये जुट गये तो उनके घरवालों
ने उन्हें बेबकूफ कहा।लोकमंगल के लिये जब कोई आदमी बड़ा काम करता है,तब उसकी पहचान यह है कि दुनिया के लोग उसको अमूमन बेबकूफ बताया करते हैं।इसलिये यह बात साफ़ है कि ये
पागल मनुष्य जिस बात की प्रशंसा कर रहे हों तो
समझना चाहिये कि दाल में कहीं काला है।

                              परमपूज्य गुरुदेव
                      (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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