अमृतवाणी-121/122/123

भगवान शंकर का भी एक कलेवर है और एक प्राण, एक बहिरंग स्वरूप है और एक अंतरंग स्वरूप।जब हम दोनों को मिला देंगे तब पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तारों को मिलाकर जिस तरीके से स्पार्क उठते हैं और करेंट चालू हो जाता है, उसी प्रकार से भगवान का करेंट चालू हो जायेगा । बहिरंग रूप के बारे में आप जानते हैं और जिस तक आप सीमित हो गये हैं, वह कलेवर है जो मंदिर में बैठा हुआ है । जिसके चरणों में हम मस्तक झुकाते हैं, जल चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, आरती उतारते हैं और जय जयकार करते हैं-वह बहिरंग है जिसकी भी सख्त जरूरत है, परन्तु यही सब कुछ नहीं है ।हमें अंतरंग रूप के बारे में भी जानना चाहिये ।भगवान शंकर का अंतरंग रूप क्या है  ? उसकी फिलॉसफी क्या है ? भगवान शंकर का रूप गोल बना हुआ है ।गोल क्या है-ग्लोब । यह सारा विश्व ही तो भगवान है ।अगर विश्व
को इस रूप में मानें तो हम उस अध्यात्म के मूल में चले जायेंगे जो भगवान राम और कृष्ण ने अपने भक्तों को दिखाया था ।गीता के अनुसार जब अर्जुन मोह में डूबा हुआ था, तब भगवान ने अपना विराट रूप दिखाया और कहा-यह सारा विश्व- ब्रह्मॉड जो कुछ भी है, मेरा ही रूप है ।

                              परमपूज्य गुरुदेव
                      (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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एक दिन यशोदा कृष्ण को धमका रहीं थीं कि तैने मिट्टी खाई है ।वे बोले-नहीं, मैंने मिट्टी नहीं खाईं  और उन्होंने मुँह खोलकर सारा विश्व ब्रह्मॉड दिखाया और कहा-यह असली रूप है ।भगवान राम ने भी यही कहा था ।रामायण में वर्णन  आता है कि माता कौशल्या और काकभुशुण्डि जी को उन्होंने अपना विराट रूप दिखाया था ।इसका मतलब यह है कि हमें सारे विश्व को भगवान की विभूति, भगवान का स्वरूप मानकर चलना चाहिए ।शंकर की गोल पिंडी उसी का छोटा सा स्वरूप है जो बताता है कि यह विश्व - ब्रह्मॉड
गोल है, एटम गोल है, धरती माता-विश्व माता गोल है ।इसको हम भगवान का स्वरूप मानें और विश्व के साथ वह व्यवहार करें जो हम अपने लिए चाहते हैं दूसरों से,तो मजा आ जाये।फिर हमारी शक्ति, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमता वह हो जाए जो शंकर भक्तों की होनी चाहिये ।
भगवान शंकर के स्वरूप का कैसा-कैसा सुन्दर चित्रण मिलता है  ? शिवजी की जटाओं में से गंगा प्रवाहित हो रही है ।गंगा का मतलब है-ज्ञान की गंगा ।पानी बालों में से प्रवाहित नहीं होता, यदि होगा तो आदमी डूब जायेगा, पैदल नहीं चल सकता । इसका मतलब यह है कि शंकर भक्त के मस्तिष्क में से ज्ञान की गंगा प्रवाहित होनी चाहिये, उसकी विचारधारा उच्चकोटि की और उच्चस्तरीय होनी चाहिये ।

अमृतवाणी
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भगवान शंकर के मस्तक के ऊपर चन्द्रमा लगा हुआ है । चन्द्रमा शांति का प्रतीक है, जो बताता है कि हमारे मस्तिष्कको संतुलित होना चाहिये, ठंडा होना चाहिये, बलिष्ठ होना चाहिए ।हम पर मुसीबतें आती हैं, संकट के, कठिनाई के दिन आते हैं । हर हालत में हमें अपनी हिम्मत बनाकर रखनी चाहिए कि हम हर मुसीबत का सामना करेंगे ।इनसानों ने बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना किया है ।जो घबरा जाते हैं, उनका मस्तिष्क संतुलित नहीं रहता, गर्म हो जाता है ।जिस व्यक्ति का दिमाग ठंडा है, वही सही ढंग से सोच सकता है और सही काम कर सकता है । पर जिसका दिमाग गरम हो जाता है, असन्तुलित हो जाता है, तो वह काम करता है जो नहीं करना चाहिए और वह सोचता है कि जो नहीं सोचना चाहिए ।मुसीबत के वक्त आज जब घटायें चारों ओर से हमारी ओर घुमड़ती हुई आ रही हैं, तब सबसे जरूरी बात हैहम शंकर भगवान के चरणों में जायें ।आरती उतारने के बाद मस्तक झुकायें, और यह कहें कि आपके मस्तक पर शांति का प्रतीक, संतुलन का प्रतीक, विभेद का प्रतीक चन्द्रमा लटक रहा है । क्या आप हमको धीरज देंगे नहीं  ? संतुलन देंगे नहीं  ? क्या शांति नहीं देंगे  ? क्या आप इतनी भी कृपा नहीं कर सकते  ? अगर हमने यह प्रार्थना की होती तो मजा आ जाता, फिर हम शांति ले करके आते और शंकर जी के भक्तों के तरीके से रहते।
                                   परमपूज्य गुरुदेव
                           (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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