अमृतवाणी-88/89/90
अमृतवाणी
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जब हम अपने गुरुजी की उम्र सात सौ साल बताते
हैं तो सोच सकते हैं कि गायत्री माता की उम्र क्या व
कितनी होगी ? उस उम्र की आप कल्पना भी नहीं कर सकते।सृष्टि जितनी पुरानी है,उससे भी कहीं
अधिक आयु की यह गायत्री माता हैं।फिर सोलह
साल की यह सुन्दर नयन-नक्शों वाली युवती क्यों
बनाई ? अरे ! हमने आपको विचार करना सिखाया कि युवा नारी के बारे में आपको पवित्र दृष्टि रखते
हुये यौन शुचिता का अभ्यास करना चाहिये।आप
बेहूदे हैं।नारी को बाहर के तरीक़े से देखते हैं।नारी में
आपको माता,बहिन,बेटी नहीं दिखाई पड़ती।आपको तो सब वैश्या ही वैश्या दिखाई पड़ती है।
हम आपकी दृष्टि बदलना चाहते हैं।कामुकता प्रधान चिंतन से आपको निकालकर एक नई दृष्टि
देना चाहते हैं।यही मानसिक ब्रह्मचर्य है।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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मित्रो ! हम ये कह रहे थे कि आप ग़लत सोचने का
तरीक़ा अपना बदल लें।रहन-सहन के तरीक़े बदल
लें। जो साधन-सामग्री आपके पास है,रूपया-पैसा,
चॉदी,ज़मीन है,अक़्ल है,इनका सदुपयोग करना आप सीख लें।आपके कमाने का क्या तरीक़ा है ? मुझे नहीं मालूम।पर आप एक बात का जबाब
दीजिये कि आप इन्हें ख़र्च कैसे करते हैं ? किस आदमी ने कैसे कमाया यह हिसाब मैं नहीं करता।
मैं तो अध्यात्म की दृष्टि से विचार करता हूँ कि किस आदमी ने कैसे ख़र्च किया ? जो कमाया वह
ख़र्च कहॉ हुआ ? मुझे ख़र्च का ब्यौरा दीजिये।बस ? अगर आप ख़र्च अपव्यय में करते हैं ग़लत
कामों में करते हैं,फ़िज़ूलख़र्ची करते हैं तो मैं आध्यात्मिक दृष्टि से आपको बेईमान कहूँगा।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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आदमी को हम अध्यात्म का अंकुश लगाते हुये ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसा आदमी जीने को कहते हैं।आपको 500रुपये तनख़्वाह मिलती है।लेकिन आप उसे औसत नागरिक के नाते ख़र्च कीजिये।
विद्यासागर की तरह 50 रुपयों मे अपनी गृहस्थी का गुज़ारा करें व 450 रुपयों में अनेकों के लिये
समाज के लिये,दुखी-अभावग्रस्तों के लिये सुरक्षित
करिये।उनके साढ़े चार सौ रुपयों से हज़ारों विद्यार्थी
निहाल हो गये।जो फ़ीस नहीं दे सकते थे,जो कापी
नहीं ख़रीद सकते थे,जिनके पास मिट्टी का तेल नहीं था उनके लिये सारी व्यवस्था विद्यासागर ने अपने
यहॉ कर रखी थी।इसे क्या कहते हैं-यह अध्यात्म है।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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