सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-30
इस तरह उस दबंग भाई को अन्य गायत्री साधक बन्दी भाइयों से एक साल तक जप और यज्ञ कराकर गुरुदेव ने क्षत-विक्षिप्त शरीर में भी जान डाल दी। गुरु की कृपा कब और किस रूप में किसके द्वारा साधना कराकर वे बरसा दें, कुछ कहा नहीं जा सकता है ? हॉलाकि इस घटना को हम लोग भूल चुके थे लेकिन अभी कुछ दिनों पहले एक भाई जो इस साधना में शामिल था तथा काफ़ी साल पहले वह बाइज्ज़त बरी हो चुका है मिलने आया था तब उसने यह घटना याद दिलाई। गुरु के अनुदानों के समक्ष पता नहीं वह दबंग भाई कृतज्ञ है या नहीं। लेकिन जिन लोगों ने लगातार जप और यज्ञ अन्दर रहकर दूसरों की भलाई के लिए किये हैं और उनके सकारात्मक परिणाम देखे हैं वे आज भी गुरुकृपा के समक्ष नतमस्तक हैं। मौत के मुँह से जिस भाई को गुरुदेव ने निकाला उसका नाम सतीश(बदला हुआ नाम) था।इसी के उलट एक और भाई याद आया जो बहुत दबंग और दयालु था।दबंगई के साथ दयालु होना अपनेआप में एक विशेषता है क्यों कि अपने लिये तो कोई भी दबंगई दिखा सकता है लेकिन जो अपने साथियों के लिये भी करुणा का भाव रख सके यह बहुत बड़ी बात है और उस भाई का नाम था बाबू दादा (बदला हुआ नाम)।ज्यादातर बन्दी भाई उसे दिल से चाहते थे। एक बार हम लोग जब यज्ञ के लिये पहुँचे तो बाबू अपने घर वालों से मिलकर लौट रहा था, जाली के आर-पार से मिलना होता था तथा घर वाले जो भी सामान लाते थे वह प्रशासन के द्वारा जॉचने के बाद बन्दी भाई को दे दिया जाता था, वही सामान लेकर वह अपनी बैरक की ओर लौट रहा था कि एक बन्दी ने कहा दादा मेरे पास तौलिया नहीं है, बाबू ने झट से नया तौलिया जो घर से आया था तुरन्त उसे दे दिया। इसी तरह कुछ ने बिस्कुट, फल आदि जिसको जो चाहिए था देता हुआ आता जा रहा था कि अचानक उसकी निगाह हम लोगों पर पड़ते ही प्रणाम करके बन्दियों की ओर मुखातिब होकर बोला अरे छोरा अब एक नमकीन का पैकेट ही बचा है, मेरी मॉ आ गयी, हवन के बाद भोग लगाकर तुम सबको बॉटेगी। मैंने उसे समझाया कि इतना सारा सामान घर से मँगवाकर इन लोगों को बॉट देते हो, अपने लिये तो कुछ रखाकर बेटा ? उसका जवाब सुनकर हैरान थी, मेरे लिये तू आती तो है, सामान का क्या करूँगा।इनके यहाँ से न तो कोई मिलने आता है और ना ही कोई सामान। भगवान ने दिया है तो दे देता हूँ। मुझे तो तेरा प्यार चाहिए दीदी।कभी माँ कहता कभी दीदी, परन्तु जो भी कहता था दिल से और सचमुच वह प्यार भी दिल से करता था सभी को।
क्रमशः!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें