अमृतवाणी-161/162/163

श्राद्ध विशेष
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अमेरिका के एक दरिद्र व्यक्ति आर्थर एडवर्ड स्टिलबैल ने अपनी जिन्दगी 40 डालर प्रति मास जैसी कुलीगीरी की छोटी-सी नौकरी से आरम्भ की और वह प्रेतात्माओं की सहायता से उच्च श्रेणी के यशस्वी धनवान विद्वानों की श्रेणी में सहज ही जा पहुंचा।
पन्द्रह वर्ष की आयु से ही उसके साथ छह प्रेतों की एक मण्डली जुड़ गई और जीवन भर उसका साथ देती रही। इन छह प्रेत में तीन इंजीनियर एक लेखक एक कवि और एक अर्थ विशेषज्ञ था। इनके साथ उसकी मैत्री बिना किसी प्रयोग परिश्रम के अनायास ही हो गई और वे उसे निरन्तर उपयोगी मार्गदर्शन कराते रहे। प्रेतों ने उसकी लगी लगाई नौकरी छुड़वादी और कहा चलो तुम्हें बड़ा आदमी बनावेंगे। प्रेतों ने उसे अपने रेल मार्ग बनाने—अपनी नहर खोदते—अपना बन्दरगाह बनाने के लिए कहा। बेचारा आर्थर स्तब्ध था कि नितान्त दरिद्रता की स्थिति में किस प्रकार करोड़ों, अरबों रुपयों से पूरी हो सकने वाली योजनाएं कार्यान्वित कर सकने में सफल होगा, पर जब प्रेतों ने उसे सब कुछ ठीक करा देने का आश्वासन दिया तो उसने कठपुतली की तरह सारे काम करते रहने की सहमति देदी और असम्भव दीखने वाले साधन जुटने लगे।
आर्थर पूरी तरह प्रेतों पर निर्भर था। उसके पास न तो ज्ञान था न अनुभव और न साधन। फिर भी उसके शेखचिल्ली जैसे सपने एक के बाद एक सफलता की दिशा में बढ़ते चले गये और धीरे-धीरे अपनी सभी योजनाओं में जादुई ढंग से सफल होता चला गया। 26 सितम्बर 1928 को वह मरा तो अपनी अरबों की धन राशि छोड़कर मरा। उसकी अपनी पांच लम्बी रेलवे लाइनें थीं। जहाजों के आने-जाने की क्षमता से सम्पन्न विशालकाल नहर पोर्ट आर्थर का वह स्वामी था। उसी के नाम एबना पोर्ट आर्थर बन्दरगाह भी उसका अपना था और भी उसके कितने ही अरबों रुपयों की पूंजी के अर्थ संस्थान थे।
उसने साहित्य के तथा कविता के प्रति प्रसिद्ध तीस ग्रन्थ भी लिखे। जो साहित्य क्षेत्र में भली प्रकार सम्मानित हुए।
आर्थर से उसकी सफलताओं का जब भी रहस्य पूछा गया तो उसने अपने संरक्षक प्रेतों की चर्चा की और बताया प्रत्येक महत्वपूर्ण योजना, अर्थ साधनों की अर्थ व्यवस्था, कठिनाइयों की पूर्व सूचना, गतिविधियों में मोड़-तोड़ की सारी जानकारी और सहायता इन दिव्य सहायकों से ही मिलती रही है। उनकी अपनी योग्यता नगण्य है। साहित्य सृजन के सम्बन्ध में भी उसका यही कथन था कि यह कृतियां वस्तुतः उसके लेखक और कवि प्रेत सहायकों की ही हैं। उसने तो कलम कागज भर का उपयोग करके यह प्राप्त किया है।
उदार पितर सत्ताएं अपने सहयोग से मनुष्य की समृद्धि और प्रगति को ऐसे ही सम्भव बनाती हैं।
कुछ पितर सहज उदारता और सात्विक स्वभाव वश सत्पात्रों को अनायास ही सहयोग-सत्प्रेरणा उड़ेल देते हैं। कुछ को उनके अनुकूल दिव्य सहयोग मार्ग दर्शन के दायित्व ही सृष्टि-संचालक विराट सत्ता द्वारा उसी प्रकार सौंप दिये जाते हैं। जिस प्रकार मनुष्य को इस सृष्टि-व्यवस्था को अधिकाधिक सुन्दर-समृद्ध बनाने के दायित्व सौंप रखे गये हैं और अधिकांश मनुष्य भले ही अनुत्तरदायित्व की पराकाष्ठा का परिचय देते हों किन्तु प्राणवान, परिष्कृत लोग तो अपनी दायित्व का निर्वाह करते ही हैं।
कुछ पितर ऐसे भी होते हैं, जो आत्माविभक्ति की आकांक्षा पूरा करने के लिए अनुकूल माध्यम स्वयं चुनते हैं। लेखन-संगीत-कला आदि के क्षेत्रों में अदृश्य सहयोग कई बार ऐसी पितर-सत्ताओं द्वारा भी प्रदान किया जाता है।

                                परमपूज्य गुरुदेव
                      (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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जवान आदमी जब ज्यादा बुड्ढा हो जाता है तो कमर झुकने लगती है, ऑखें नीची हो जाती हैं,लाठी टेककर चलता है।इनसान की जवानी चली जाती है तो वह बौना हो जाता है, घटिया हो जाता है, कमर झुक जाती है, उसका आसमान की ओर देखने का न मन होता है ,न उसकी बनावट ही ऐसी रह जाती है कि वह ऊपर देखे।अधिकांश आदमी आज ऐसे हो गये हैं।लेकिन आप ऊपर की ओर सिर उठाकर देखेंगे, हमें आपसे यह उम्मीद है।यह उम्मीद है कि ऐसे भयंकर समय में अपना सारा वक़्त केवल पेट पालने के लिए और सन्तान पैदा करने के लिए जाया नहीं करेंगे।अगर आप चाहें तो ढेरों समय बचा सकते हैं, बीस घन्टे में अपना, अपने शरीर व कुटुम्ब का आराम से आप गुजारा कर सकते हैं ।आठ घन्टा काम करने के लिए, सात घन्टा विश्राम के लिए, और पॉच घन्टा घरेलू काम के लिए।फ़िर भी चार घन्टा आप समाज के लिए आई हुई परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए ,समय को ऊँचा उठाने के लिए इनसान का भाग्य और भविष्य शानदार बनाने के लिए आप लगा सकते हैं।करना ही पड़ेगा यह आपको।इसमें तो नुकसान पड़ेगा  ? नहीं, मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि नुकसान नहीं पड़ेगा।जिन्होंने भी अपने समय को लोकसेवा में लगाया है, वे चाहे गॉधी रहे हों या नेहरू, विनोबा रहे हों या विवेकानंद, किसी भी तरह वे नुकसान में नहीं रहे हैं।वे ऊँचा उठे हैं, आगे बढ़े हैं और उन्होंने हजारों आदमियों को ऊँचा उठाया व आगे बढ़ाया है।स्वयं भी नफे में रहे हैं।वे नुकसान में रहे  ? क्या नुकसान में रहे आप बताइए  ? किसी एक का नाम तो बताइये ।

                                   परमपूज्य गुरुदेव
                          (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अशरीरी आत्माओं का अस्तित्व और उनके द्वारा मनुष्य को सहयोग यह एक तथ्य है। डरावनी या घिनौनी प्रकृति के भूत प्रेत कम ही होते हैं। साधारणतया उच्च आत्माएं मनुष्यों की सहायता ही करती हैं और अपनी उच्च प्रवृत्ति के कारण दूसरों को आगे बढ़ाने तथा खतरों से बचाने के लिये पूर्व संकेत भी करती हैं। जिस प्रकार उदार मनुष्य अकारण दूसरों की सेवा सहायता करने के लिये तैयार रहते हैं वैसे ही सूक्ष्म शरीरधारी आत्माएं लोगों को उपयोगी ज्ञान देने अथवा आत्मा का अस्तित्व शरीर न रहने पर भी बना रहता है यह विश्वास दिलाने के लिये कुछ व्यावहारिक सहयोग देती रहती हैं।
महान् सन्त सुकरात के बारे में बताया जाता है कि प्रारम्भिक जीवन में उन्हें धर्म-कर्म एवं अदृश्य जीवन पर कतई विश्वास नहीं था। एक दिन उन्हें एक प्रेत मिला। उसने अतीन्द्रिय दर्शन की क्षमता उनमें विकसित करने हेतु भगवत् भजन का परामर्श दिया। शीघ्र ही सुकरात की यह क्षमता विकसित हो गई। प्रेत उन्हें आजीवन विशिष्ठ मामलों में जानकारी व परामर्श देता रहा। इससे सुकरात सहस्रों व्यक्तियों का कल्याण करते। उन्होंने बताया तो यह तथ्य अपने साथियों को भी। पर साथी-सहयोगी प्रेत को देख नहीं सकते थे, अतः वे सुकरात के भविष्य-कथन आदि को उन्हीं की चमत्कारिक शक्ति मानने लगे।
प्लेटो, जेनोफेन, प्लुटार्क आदि विद्वानों ने सुकरात के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं पर प्रकाश डाला है। उन सभी ने स्वीकार किया है कि—सुकरात ने अनेकों बार यह कहा—‘‘मेरे भीतर एक रहस्यमय देवता ‘डेमन’ निवास करता है और वह समय पर मुझे पूर्व सूचनाएं दिया करता है।’’ इस तथ्य की यथार्थता के अनेक प्रमाण उद्धरण भी उपरोक्त लेखकों ने प्रस्तुत किये हैं।
प्लूटार्क ने अपनी पुस्तक ‘‘दी जेनियो सोक्रिटिस’’ में एक घटना दी है—एक बार सुकरात अपने कई मित्रों के साथ एक रास्ते जा रहे थे। सहसा वे रुक गये और कहा इस रास्ते हमें नहीं चलना चाहिये खतरा है। कइयों ने उसकी बात मान ली और वह रास्ता छोड़ दिया पर कई इस साफ सुथरे रास्ते को छोड़ने के लिये तैयार न हुये। वे सुकरात की सनक को बेकार सिद्ध करना चाहते थे। वे कुछ ही दूर गये होंगे कि जंगली सुअरों का एक झुण्ड कहीं से आ धमका और उनमें से कइयों को बुरी तरह घायल कर दिया। प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘‘थीवीज’’ में एक प्रसंग दिया है—एक दिन एक तिमार्कस नामक युवक सुकरात के पास आया कुछ खाया पिया। जब चलने लगा तो सुकरात ने उसे रोका और कहा अभी तुम जाना मत, तुम्हारे ऊपर खतरा मंडरा रहा है। तीन बार उसने जाने की चेष्टा की पर तीनों बार सुकरात ने उसे पकड़ कर बल पूर्वक रोक लिया। पीछे वह नहीं ही माना और हाथ छुड़ा कर चला गया। दूसरे ही दिन उसने एक खून कर डाला और फांसी पर चढ़ाया गया। ऐसी ही अन्य कितनी ही घटनाएं हैं जिनमें सुकरात के उसके सहचर देवता ‘डेमन’ द्वारा पूर्वाभास दिये जाने तथा सहायता करने के प्रमाण मिलते हैं।

                                     परमपूज्य गुरुदेव
                            (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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