अमृतवाणी-58/59/60
अमृतवाणी
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भगवान का,विश्व मानव का आप पर ऋण है।इसके लिये पहली बात समय से चलती है।समय के साथ
काम में तन्मय होने की कला।व्यस्तता इसे कहते हैं
कि आदमी इस क़दर लक्ष्य में तन्मय हो जाता है कि
उसे समय का कोई ख़याल नहीं रहता।आप युग-
अनुसन्धान,मानव धर्म की खोज,विज्ञान-अध्यात्म की शोध के विषय में गँभीर हैं तो आप वहॉ से शुरु
कीजिये जहॉ से आपको टाइम देना पड़ेगा।यदि दे
सकें तो समुद्र-मँथन कीजिये।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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समुद्र बहुत विशाल है।हमारा विचार-परिकर बहुत
विस्तृत है,समुद्र के तरीक़े से।यदि हम इसमें गोते लगा सके तो बहुमूल्य मणि-माणिक्य इसमें से निकल सकेंगे।आप अपनी बुध्दि का सही उपयोग
करके,समय देकर अपने सही अर्थों में बुध्दिजीवी
होने के प्रमाण दीजिये।आप पर सारे समाज का,
युग का एक ऋण चढ़ा है,महती दायित्व है।उसे
निभाइये।बताइये विज्ञान का विज्ञान,अध्यात्म का
अध्यात्म।तभी तो दोनों मिल सकेंगे।अगली पीढ़ी
को महामानव बनाने के लिये इससे कम स्तर के
पुरुषार्थ से काम नहीं चलने वाला ।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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आप चाहते हैं कि आपको कुछ मिले तो वज़न उठाइये।हम आपको मुफ़्त देना नहीं चाहते,क्यों कि
इससे आपका अहित होगा।वह हम चाहते नहीं।आप हमारा कहना मानें तो हम देने को तैयार हैं।गुरु-शिष्य की परीक्षा एक ही है कि अनुशासन मानते हैं हम आपके शिष्य,ऐसा कहें व मानें।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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