गुरुगीता-3
रामानुज के जीवन का उद्देश्य परोपकार और दूसरों की
कल्याण भावना ही था।वैष्णव सम्प्रदाय के एक मंत्र का रहस्य जानने के लिए वे यामुनाचार्य के एक वृद्ध शिष्य
गोष्ठीपूर्ण स्वामी जी के पास गये ।उन्होंने 18 बार रामानुज की प्रार्थना को टाल दिया ।जब उन्होंने 19वीं बार वही प्रार्थना की तो वे इस शर्त पर मंत्र का रहस्य बतलाने को राजी हुये कि वह किसी अनाधिकारी व्यक्ति को कभी न बतलाया जाये ।
"गोष्ठीपूर्ण स्वामी" से मंत्र दीक्षा लेकर वे अपने निवास स्थान को लौटे।रास्ते में नृसिंह स्वामी का मंदिर मिला जहाँ पर उस दिन मेले के कारण वैष्णवों की अपार भीड़ थी ।उस समुदाय को देखकर रामानुज से रहा न गया और
उन्होंने ज़ोर-ज़ोर से उस मंत्र को दुहराकर सब लोगों को उसे अच्छी तरह सुना दिया ।यह समाचार जानकर "गोष्ठीपूर्ण स्वामी"बहुत नाराज़ हुए और रामानुज को बुलाकर कहा-"क्या तुम्हें मालूम है कि गुरु की आज्ञा न मानने का क्या फल होता है ?"
रामानुज ने हाथ जोड़कर कहा-"हॉ गुरुदेव मैं जानता हूँ कि ऐसा आचरण करने पर दस हजार वर्ष तक नर्क में रहना पड़ता है ।"
गोष्ठीपूर्ण ने पूछा-"तब तुमने मेरी आज्ञा के विरुद्ध उस मंत्र को उन लोगों को क्यों बतलाया ?"
रामानुज ने उत्तर दिया-'भगवन! मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ ।पर आपने ही मुझे बतलाया था कि इस मंत्र के सभी सुनने वाले स्वर्ग जायेंगे ।इतने लोगों को वहॉ इकट्ठा देखकर मेरे मन में यह भाव उठा कि मंत्र को सुनकर उन सब लोगों को स्वर्ग प्राप्त हो, चाहे मुझे नरक में ही क्यों न जाना पड़े ।मेरे इस अपराध के लिए आप जो कुछ दण्ड देंगे उसे मैं भोगने को तैयार हूँ ।'
रामानुज के उत्तर से गोष्ठीपूर्ण शांत हो गये और रामानुज को गले लगाकर कहने लगे-तुम्हीं मेरे गुरू हो ! यही सच्चे वैष्णव का कर्तव्य है ।
गुरुगीता पाठ
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केन मार्गेण भो स्वामिन्, देही ब्रह्ममयो भवेत ।
त्वं कृपां कुरु मे ब्रह्मन्, नमामि चरणों तव ।।4।।
अन्वयः-
भो स्वामिन-हे स्वामी, ब्रह्मन्-हे ब्रह्म, केन मार्गेण- किस उपाय से, देही-जीव, ब्रह्ममयः - ब्रहममय, भवेत्- होता है,
त्वम्- आप, मे-मुझे, कृपांकुरु- कॄपया बोलें, तव- आपके,
चरणों- चरणों में, नमामि- प्रणाम करती हूँ ।।4।।
अर्थ-
हे स्वामी, हे ब्रह्म किस उपाय से जीव ब्रह्ममय होता है, आप
मुझे कृपा करके बताएं ।मैं आपके चरणों में प्रणाम करती हूँ ।
4_Tha divine consort of Lord Shiva continued, "Master you are verily Brahma
itself, so kindly elucidate tha means by
Which an ordinary human being having
a physical body can become Brahma itself. I again offer my Salutation at your Lotus feet"
👣🙏
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