गुरुगीता-51
शिष्यत्व तो समर्पण की साधना है- जिसका एक ही अर्थ है- अहंकार का अपने सद्गुरु के चरणों में विसर्जन। हालांकि इस समर्पण- विसर्जन के साथ भी कई तरह के भ्रम जनमानस में व्याप्त हैं। कई लोगों का सोचना है कि जब हमने समर्पण कर दिया- तब हम फिर कुछ काम क्यों करें? जब तृष्णा नहीं सुख की लालसा नहीं तब फिर मेहनत किसलिए? ये सवाल दरअसल भ्रमित मन की उपज है। जो जानकार हैं, समझदार हैं वे जानते हैं कि समर्पण और श्रद्धा का मतलब- निकम्मापन या निठल्ले बैठे रहना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है- सत्य के लिए, अपने गुरुदेव के लिए स्वयं को सम्पूर्णरूप से झोंक देना। इस सम्बन्ध में रमण महर्षी कहा करते थे- यह कैसी उलटबांसी है कि मिट्टी की खोज में आदमी सब कुछ लगा देता है- पर अमृत की खोज में कुछ भी नहीं लगाना चाहता। जबकि शिष्य तो वही है- जो गुरु के एक इशारे पर जीवन पर्यन्त अटूट और अथक श्रम करता रहे।
केवल शिष्य ही जीवन का सच्चा ज्ञाता होता है, इसलिए उसे जीवन की महान् सम्भावनाओं को उजागर करने में तत्पर रहना चाहिए। यह तभी सम्भव है कि जब उसके मन में अपने और सभी के जीवन का सम्मान हो। साथ ही वह सुख के लिए इधर- उधर भटके नहीं बल्कि अपने कर्त्तव्य पालन में सुख की अनुभूति करे। भगवान् बुद्ध का कथन है कि इस संसार में सुखी वही है, जिसने सुख की वासना छोड़ दी है। वास्तविकदुख तो वासनाओं का है। जो जितना ज्यादा वासनाओं, कामनाओं एवं लालसाओं से भरा है, वह उतना ही ज्यादा दुःखी है। वासनाओं और लालसाओं के छूटते ही अन्तश्चेतना में शान्ति और सुख की बाढ़ आ जाती है। सब तरफ से सुख ही सुख बरसता है। समूची प्रकृति हर पल मन- अन्तःकरण को सुख से भिगोती रहती है।
समर्पण, श्रमशीलता के साथ शिष्य को हर पल जागरूक भी रहना जरूरी है। उसे हमेशा सजग रहना पड़ता है कि कहीं कोई दुराचार, कोई बुरा भाव तो उसके अन्तःकरण में नहीं पनप रहा। कोई पाप तो उसकी अन्तर्चेतना में नहीं अंकुरित हो रहा। यद्यपि श्रद्धालु शिष्य में इसकी सम्भावना कम है, परन्तु वातावरण का कुप्रभाव कभी भी किसी पर भी हावी हो सकता है। इस समस्या का समाधान सूत्र एक ही है- अपने प्रति कठोरता, दूसरों के प्रति उदारता। औरों के प्रति हमेशा प्रेमपूर्ण व्यवहार करने वाले साधक को अपने प्रति हमेशा ही कठोर रहना पड़ता है। हमेशा ही अपने बारे में सावधानी बरतनी पड़ती है।
गुरुगीता पाठ
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एवम्बिधं गुरुं ध्यात्वा ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम् ।
तदा गुरुप्रसादेन मुक्तोsहमिति भावयेत् ।।55।।
अर्थ
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इस प्रकार गुरु का ध्यान करने से ज्ञान अपने आप उत्पन्न होता है, उस समय मैं मुक्त हूँ, यह भावना करो।।55।।
55.When one meditate on the Master like this the Master is pleased and the knowledge automatically dawns of the aspirant. At that time one should contemplation that I am liberated.
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