अमृतवाणी-61/62/63

अमृतवाणी
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समर्थ ने अपने शिष्य की परीक्षा ली थी व सिंहनी का दूध लाने को कहा था,अपनी ऑंख की तकलीफ़
का बहाना करके।सिंहनी कहॉ थी ? वह तो हिप्नो-
टिज्म से एक सिंहनी खड़ी कर दी थी।शिवाजी का
संकल्प दृढ़ था।वे ले आए सिंहनी का दूध व अक्षय तलवार का उपहार गुरु से पा सके।राजा दिलीप की
गाय को जब मायावी सिंह ने पकड़ लिया तो उन्होंने
स्वयं को सौंप दिया।इस स्तर का समर्पण हो तो ही
गुरु की शक्ति-दैवी अनुदान मिलते हैं।यहआस्थाओं का इम्तिहान है,जो हर गुरु ने अपने शिष्य का लिया
है ।

                              परमपूज्य गुरुदेव
                      (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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हम गायत्री की फिलॉसफी व युग के देवता विज्ञान
की बात आपको बताते आये हैं।यह ब्रह्मविद्या घर-
घर पहुँचे,इसमें आप सबका सहयोग चाहते हैं।जैसे
सेतुबन्ध के लिये,गोवर्धन के लिये,अवतारों को सह-
योग मिला,हम भी चाहते हैं कि आप भी इस प्रवाह
में सम्मिलित हो जायें।आपको भी बाद में लगेगा कि
हम भी समय पर जुड़ गये होते तो अच्छा रहता।

                             परमपूज्य गुरुदेव
                      (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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विवेकशीलता,विचारशीलता,उच्चकोटि के आदर्शों
में निष्ठा इन सब चीज़ों के समन्वय का नाम है-
“ऋतम्भरा-प्रज्ञा” । ऋतम्भरा-प्रज्ञा अर्थात् विवेक-शीलता,विवेकशीलता अर्थात् उन उद्देश्यों को याद
रखना जिनके लिये भगवान ने मानव प्राणी को बनाया।इस ऋतम्भरा-प्रज्ञा की इस विश्व के प्रारम्भ
में उसी तरीक़े से अवतरणा हुई जिस तरीक़े से इस
सँसार में स्वर्ग से गंगा भगीरथ के व्दारा लाई गई।

                                 परमपूज्य गुरुदेव
                         (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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