अमृतवाणी-52/53/54
अमृतवाणी
————
आदमी की बुद्धि का श्रेष्ठतम भाग है ऋत । यह ऋत
यदि आदमी को मिल जाये तो बुद्धि सार्थक हो जाती है,विद्या सार्थक हो जाती है,प्रज्ञा सार्थक हो
जाती है और मनुष्य की ज़िन्दगी सार्थक हो जाती है। जिसमें से कुछ को भगवान ने शिक्षा दी है,वे आप मेरे समक्ष बैठे हैं।अब कमी एक ही रह जाती है
कि इस सीप में कहीं से स्वाति की बूँदें टपक जायें,
जिनके पास दिमाग़ है,शिक्षा है,उनके अन्दर श्रध्दा की,स्वाति की बूँदें गिर जायें तो आप ऋषि हो सकते
हैं,महामानव हो सकते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
————
यह अक़्ल का दुर्भाग्य है कि वह पेट भरने के काम
आज आती है।उससे भी अधिक दुर्भाग्य आदमी का
यह है कि अक़्ल जाल बुनने के काम आतीहै,वाक-
पटुता के काम आती है व दूसरों को धोखा देने के
का कुचक्र रचने के काम आती है।अक़्ल से जो हम
कमाते हैं तो क्या बतायें आपको कि हम उसे कहॉ
ख़र्च करते हैं ? अक़्ल की क़ीमत बाज़ार में ज़्यादा
मिलनी चाहिये।मिलती भी है।लेकिन उस मिलने के
बाद हम करते क्या हैं ? न जाने कहॉ उसे ख़र्च कर
देते हैं ।
परमपूज्य गुरुदेव
( पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
————
मित्रो ! यह ब्राह्मण के लिये लानत की बात है,शर्म
की बात है।भगवान के लिये अनुदानों का सबको
इस्तेमाल करना चाहिये।दूसरे लोग यदि अपनी अक़्ल का इस्तेमाल न कर सकें तो कम से कम ब्राह्मण को तो करना ही चाहिये।दिमाग़ अगर ख़राब
हो जायेगा,अक़्ल अगर ख़राब हो जायेगी तो शरीर का क्या होगा ? जिस समाज में,जिस देश में,जिस युग में,दिमाग़-ब्राह्मण अस्त-व्यस्त हो जाता है,तब
उस देश की मुसीबत आती है ।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें