गुरुगीता-43

वशिष्ठ ऋषि सूर्यवंश के कुलगुरु थे। इन्हीं के परामर्श पर राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठि यज्ञ किया था, जिसके फलस्वरूप श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न का जन्म हुआ। भगवान राम ने सारी वेद-वेदांगों की शिक्षा वशिष्ठ ऋषि से ही प्राप्त की थी। श्रीराम के वनवास से लौटने के बाद इन्हीं के द्वारा उनका राज्याभिषेक हुआ और रामराज्य की स्थापना संभव हो सकी। इन्होंने वशिष्ठ पुराण, वशिष्ठ श्राद्धकल्प, वशिष्ठ शिक्षा आदि ग्रंथों की रचना भी की।
एक बार राजा विश्वामित्र शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल आए। थोड़ी देर आराम करने के लिए वे ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में रुक गए। यहां उन्होंने  कामधेनु गाय  को देखा। नंदिनी गाय को देख विश्वामित्र ने वशिष्ठ से कहा यह गाय आप मुझे दे दीजिए, इसके बदले आप जो चाहें मुझसे मांग लीजिए, लेकिन ऋषि वशिष्ठ ने ऐसा करने से मना कर दिया।
तब राजा विश्वामित्र नंदिनी को बलपूर्वक अपने साथ ले जाने लगे। तब ऋषि वशिष्ठ के कहने पर नंदिनी ने क्रोधित होकर विश्वामित्र सहित उनकी पूरी सेना को भगा दिया। ऋषि वशिष्ठ का ब्रह्मतेज देख कर विश्वामित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने भी अपना राज्य त्याग दिया और तप करने लगे।

गुरुगीता पाठ
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न मुक्ता देवगंन्धर्वा: पितरो यक्षकिन्नरा:।
ऋषय: सर्वसिद्धाश्र्च गुरुसेवापरांड्मुखा।।45।।
अर्थ
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गुरुसेवा परांड्मुख देवता और गन्धर्वगण पितृ और यक्ष चारण गण,ॠषि और सिद्ध वृन्द मुक्त नहीं है।अर्थात् ये लोग भी गुरु सेवा करने पर ही मुक्त हो सकते हैं।।45।।
45.
The Deities the divine singers, pitras, Yakshas,charans, seers and the adepts are
not liberated ones with out rendering service unto tha Master. They can attain
emancipation only by rendering devotional service to the Master.

                                       👣🙏

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