गुरुगीता-19
अक्का महादेवी शिव की भक्त थीं। बचपन से ही उन्होंने खुद को पूरी तरह शिव के प्रति समर्पित कर दिया था और उन्हें अपने पति के रूप में देखती थीं। एक दिन एक राजा की नजर उन पर पड़ी। वह इतनी खूबसूरत थीं कि राजा ने उनसे विवाह कर लिया। लेकिन अपने मन और चेतना में तो वह शिव से विवाह कर चुकी थीं। कुछ सालों की निराशा के बाद, राजा इतना भड़क गया कि वह उन्हें दरबार तक ले आया और उन पर व्याभिचार के आरोप लगाए। महादेवी ने कहा, “अरे मूर्ख इंसान! मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हूं। तुम एक सामाजिक घटना के कारण मुझे पत्नी मानते हो लेकिन ऐसा नहीं है। मेरे पास जो कुछ भी है, उसे मैं पहले ही किसी और को दे चुकी हूं।” राजा ने अपना आपा खो दिया और बोला, “तुम्हारे पास जो भी है, वह मेरा है। गहने, कपड़े, सब कुछ। तो तुम कैसे कह सकती हो कि तुम्हारी ज़िन्दगी किसी और की है!” फिर पूरे दरबार के सामने 18 वर्ष की नवयुवती अक्का महादेवी ने अपने सारे कपड़े त्याग दिए और वहां से चली गईं। उस दिन से वह नग्न अवस्था में ही रहीं, उन्होंने सिर्फ कपड़ों का आवरण ही नहीं, बल्कि अहं और लज्जा का, यहां तक कि खुद का आवरण भी उन्होंने त्याग दिया। उन्होंने बहुत उम्दा कविताएं लिखीं, उनकी भक्ति और प्रेम को तीव्र रूपों में अभिव्यक्ति मिली। उनकी भक्ति ऐसी अनोखी थी कि वह हर रोज भिक्षा मांगते हुए शिव से कहतीं-
“शिव ऐसा करो कि मुझे भोजन न मिले। आपका हिस्सा बनने के लिए मैं जिस बेकरारी और पीड़ा से गुजर रही हूं, मेरा शरीर भी उसे प्रकट करे। अगर मैं भोजन करूंगी, तो मेरा शरीर तृप्त हो जाएगा और उसे पता भी नहीं चलेगा कि मैं क्या महसूस कर रही हूं। इसलिए ऐसा करो कि मुझे भोजन नसीब न हो। अगर भोजन मेरे हाथों में आ जाए, तो वह मेरे मुंह में जाने से पहले मिट्टी में गिर जाए। अगर वह मिट्टी में गिर जाए, तो इसके पहले कि मेरी जैसी मूर्खा उसे उठाने की कोशिश करे, कोई कुत्ता आकर उसे ले जाए। ”
यह उनकी हर रोज़ की प्रार्थना थी।
गुरुगीता
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आसनं शयनं वस्त्रं वाहनं भूषणादिकम् ।
साधकेन प्रदातव्यं गुरो:सन्तोषकारणात् ।।21।।
अर्थ
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साधक को गुरुदेव के सन्तोष के लिए आसन, शय्या, वस्त्र, वाहन और भूषण आदि प्रदान करना उचित है ।।21।।
21 .
The disciple should offer clothes, bedding, ornaments, conveyance and Asan Seat to the Master for the later's satisfaction.
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