सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-31

बाबू का बन्दियों के प्रति प्यार बढ़ रहा था और कुछ लोगों को ये सब सहन नहीं हो रहा था। ये वे लोग थे, जो बन्दियों पर केवल अपना रौब रखे रहना चाहते थे,सहायता कुछ भी नहीं करते थे। बाहर के संसार के कुचक्रों को अन्दर भी बखूबी कुछ लोग निभा रहे थे हॉलाकि हमें ना तो उस वक्त इसकी जानकारी थी और ना ही हम इन गतिविधियों का हिस्सा थे। हमारी अपनी सीमाओं में रहकर ही हमें गुरुदेव का सन्देश उन तक पहुँचाना था। इस बीच नवरात्रि पर्व की साधना शुरू हो गई और सुबह से शाम तक हम लोग बन्दियों के साथ व्यस्त हो गये। सुबह 6 बजे बैरकें खुलती थीं, अत: सुबह 8 बजे हम लोग पहुँचते, तब तक वे आरती कर लेते थे। उसके बाद सुबह का ध्यान गुरुदेव की आवाज़ में कराकर सीधे यज्ञ में सम्मिलित हो जाते। उसके बाद प्रज्ञा पेय (शान्तिकुन्ज द्वारा निर्मित चाय के विकल्प के तौर पर जड़ी बूटियों का पदार्थ ) पीकर सब अपनी-अपनी माला अनुष्ठान के हिसाब से पूरी करके अपने कपड़े,बैरक इत्यादि की सफाई,यज्ञशाला की सफाई का कार्य पूर्ण कर ज्योतिअवतरण साधना (गुरुमाताजी की आवाज़ में) करते।
साधना से उठकर हम लोगों द्वारा लगभग 350 बन्दी भाइयों को 1/2 लीटर दूध की थैली वितरित की जाती, जो हम लोग जनसहयोग से इकट्ठा करते थे। दूध लेने वालों में वे सभी साधक शामिल थे जो गायत्री का जप, रामायण पाठ,सप्तशती पाठ अथवा किसी भी साधना में फलाहार कर रहे थे। उसके बाद सभी भाई 1घन्टा आराम करते ,उसके बाद गुरुदेव का सन्देश वीडियो पर देखते, तब तक शाम की चाय और कोई भी फल प्रशासन द्वारा दिया जाता। उसके बाद नादयोग की साधना के लिए बैठ जाते।
नादयोग की साधना में सबको एक अलग ही उत्साह और
अनुभूतियों होतीं, बाद में सब अपना-अपना दिन भर का अनुभव बतलाते। ये पल बहुत ही भावुक होते थे, कुछ बच्चे अनुभूतियॉ बताते-बताते रोने लग जाते थे, उस समय हम सबकी हालत भी अजीब हो जाती। गुरुदेव माताजी की कृपा का एहसास उस वक्त बहुत ही घनीभूत लगता था, ऐसा महसूस होता था जैसे साक्षात् महाकाल और महाकाली उनके सामने खड़े होकर सब कुछ कहलवा रहे हों।
ऐसा ही एक वाकया याद आता है कि एक बन्दी भाई रोते-रोते बोला -दीदीजी अब मैं किसी से भी झगड़ा नहीं करूँगा और ना ही किसी को मारूँगा।
मैंने पूछा- अभी तक तो ऐसा नहीं था, तू समझाने पर भी कहता था कि आपको क्या पता, भोगा तो मैंने है ? जब तक बदला नहीं ले लूँगा, तब तक चैन की सांस नहीं आयेगी  ?
इतना कहते ही वह फफक-फफक कर रोते हुए बोला-ये जो माताजी हैं न ? (गुरूमाताजी के लिए) इन्होंने मुझे परसों रात को समझाकर कहा कि-तू अगर बदला लेने की भावना नहीं छोड़ेगा तो हम तेरी कुछ भी सहायता नहीं कर सकते,तू कइयों को मारने का विचार लिए फिरता है और जप गायत्री का करता है  ? तू इस विचार को मिटा दे, वे लोग तो पहले ही बर्बादी के कगार पर हैं। जप करता रह, हम तेरी सहायता करेंगे। इतना कहकर वह बहुत देर तक रोता रहा,उसके साथ हम सभी बन्दी भाईयों सहित रोना नहीं रोक पाये। माहौल बहुत ही भावुकता पूर्ण हो गया था। बाद में मैंने ही सबको हँसाते हुये उससे पूछा-अब तू इन लोगों को धमकियॉ देना और लड़ना भी छोड़ देगा न ?
इतना सुनते ही सब लोग हँस पड़े और वह भी बोला अब ऐसी शिकायत आपको कभी नहीं आयेगी।
                                           क्रमशः!!
                                     'गुरुकॄपा केवलम्'
                                "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                            👣🙏

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