गुरुगीता-9

सरमद सूफ़ी सन्त थे।एक दिन औरंगजेब सरमद के पास से गुजरे।देखा कि वे नंग-धड़ंग पड़े हैं।कंबल दूर पड़ा है।औरंगजेब ने कड़ककर कहा-नंगा क्यों पड़ा है, पास में पड़े कंबल से बदन क्यों नहीं ढक लेता, सरमद ने कहा-इतनी कृपा आप ही कर दें।मुझे तो बन नहीं पड़ता।औरंगजेब ने कंबल उठाया तो उसके नीचे उन सबके सिर थे जिन्हें उसने कत्ल कराया।औरंगजेब के बूते कंबल न उठा।तो सरमद ने कहा-तू ही बता-तेरे पापों को ढकना ज्यादा जरूरी है या अपने बदन को ढकना  ?
सरमद का दिल्ली की जनता पर असाधारण प्रभाव औरंगजेब से न देखा गया।उसके इशारों पर मुल्लाओं ने इल्जाम लगाया कि वह अधूरा कलमा पड़ता है ।अदालत में पेश किया गया तो वहाँ भी उसने वह अधूरा ही सुनाया 'ला इलाह इल्लिलाह'जिसका अर्थ होता है कि सभी दोषी हैं ।शेष अंश जो रह गया था।वह था ।'मुहम्मद रसूलिल्लाह'।सरमद का कहना था कि मैंने अभी उस देवदूत का दर्शन नहीं किया।जिन्हें देखता हूँ, दोषी पाता हूं।इस पर मुल्लाओं की अदालत में सरमद दोषी पाया गया और उसका सिर लेने का हुक्म हुआ।सरमद का सिर काट लिया गया।जब सिर कटा तो उसमें से तीन आवाजें निकलीं-'ला इलाह इल्लिलाह'।सरमद के सच्चे विश्वास की इस गवाही को देखकर सभी दंग रह गए।जिस दिन सरमद का सिर कटा उस दिन पूरी दिल्ली में रंज मनाया गया।न किसी के घर में चिराग जला न चूल्हा,बादशाह के सामने कोई कुछ कह ही नहीं सकता,पर इतना सभी ने अनुभव किया कि एक बेगुनाह सच्चे फ़कीर का कत्ल हुआ ।सूफ़ी सन्त अपनी भक्ति भावना के लिए काफ़ी लोकप्रिय रहे।सच्चे सन्त निर्भीक और भगवान पर दृढ़ भरोसा रखने वाले होते हैं ।
गुरुगीता पाठ
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गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णव-तारणम् ।
अज्ञान-मूलहरणं जन्म-कर्म-निवारणम् ।
ज्ञान-वैराग्य-सिद्धयर्थम् गुरुपादोदकं पिबेत् ।।11।।
अन्वयः-
गुरुपादोदकम्  - गुरुचरणोदक , सम्यक् - अच्छी तरह,
संसारार्णवतारणम् - संसार-समुद्र तारण, अज्ञानमूलहरणम्-
अज्ञान के मूल का नाश,जन्म-कर्म-निवारणम् - जन्म-कर्म-
का निवारण करता है, ज्ञान-वैराग्य-सिद्धयर्थम्  -ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए, गुरुपादोदकं-गुरु का चरणोदक,
पिबेत्-पीना चाहिए ।।11।।
अर्थ-
श्री गुरुदेव का चरणोदक संसार समुद्र से सम्यक् रूप से त्राण करता है, अज्ञान को समूल नाश करता है और जन्म
कर्म का निवारण करता है, ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए गुरु का चरणोदक पान करना चाहिए ।
गुरु चरणोदक पान करने से ज्ञान और वैराग्य सिद्ध होते हैं ।
ज्ञान द्वारा बहुदर्शनरूप अज्ञान दूर हो जाता है ।ऐहिक, पारलौकिक भोग समूह से वैराग्य उत्पन्न होता है ।साक्षात्
भगवान श्री गुरुदेव का चरणोदक पान करने से स्वत: ही
ज्ञान और वैराग्य लाभ होता है ।।11।।
11.
The washings of tha feet of the Master are
definitely benedictory in the process of
carrying oneself across the ocean of this
creation. It destroys every sort of ignorance and deliveres the aspirant from
the bondages of life and the aspirant should always drink the washing of the
feet of the Master for the perfection of knowledge and detachment.
COMMENTS:
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Tha perfection of knowledge and detachment is automatically achieved by
drinking the washing of the feet of the Master, with knowledge the ignorance of the form of multiplicity disappears and detachment developes for the worldly and heavenly pleasures.

                                     👣🙏

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