गुरुगीता-24

महान मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग है। एक बार उनके इलाके में कई वर्षों तक पानी नहीं बरसा। इससे लोग हाहाकार कर उठे। सिंचाई के अभाव में खेती करना भी दूभर हो गया और अकाल जैसी स्थिति निर्मित होने लगी। ऐसे में तय हुआ कि नदी पर बांध बनाया जाए, ताकि आपातकाल में उस पानी का इस्तेमाल किया जा सके।
इसके बाद शिवाजी ने अनावृष्टि से संकटग्रस्त जनता की सहायता के लिए बांध बनवाना शुरू किया। बांध के निर्माण में सैकड़ों मजदूर जुटे थे और इससे मिलने वाले पारिश्रमिक के जरिए उनकी आजीविका का प्रबंध भी होने लगा था। एक दिन शिवाजी स्वयं उस बांध का निरीक्षण करने पहुंचे। मजदूरों को जब शिवाजी के आने का पता चला तो वे उनके पास दौड़े चले आए और उनकी चरण-वंदना करते हुए उनका आभार व्यक्त करने लगे। यह देखकर शिवाजी को यह अभिमान हो गया कि वे ही इतने लोगों को आजीविका दे रहे हैं। यदि वे यह प्रयास नहीं करते तो इन सब लोगों को भूखे मरना पड़ता।
तभी समर्थ गुरु रामदास का वहां से गुजरना हुआ। शिवाजी ने जब उन्हें देखा तो आदरपूर्वक अपने साथ लेकर आए और उनका सत्कार किया। इसके बाद शिवाजी उनके समक्ष अपने उदार अनुदान का बखान करने लगे। समर्थ गुरु रामदास उनकी बात सुनकर चुप रहे। थोड़ी देर बाद जब समर्थ गुरु चलने लगे, तो शिवाजी कुछ दूर तक उन्हें छोड़ने के लिए उनके साथ आए। रास्ते में उन्हें एक पत्थर नजर आया, जिसके नीचे पानी जमा था।
समर्थ गुरु रामदास ने उस पत्थर की ओर संकेत करते हुए शिवाजी से कहा - 'इस पत्थर को तुड़वा दो।" पत्थर तोड़ा गया तो उसके नीचे पानी से भरा एक गड्ढा नजर आया, जिसमें एक नन्हीं-सी मेंढकी किलोल कर रही थी। यह देख समर्थ गुरु ने गंभीर स्वर में शिवाजी से कहा - 'इस मेंढकी के लिए संभवत: तुमने ही पत्थर के नीचे यह जीवनरक्षा की व्यवस्था की होगी?"
यह सुनकर शिवाजी का अहंकार चूर-चूर हो गया और वे गुरु के चरणों में गिर पड़े। समर्थ गुरु ने उन्हें अपनी भूमिका का बोध कराया और आतताइयों से संघर्ष हेतु नीति बनाने के लिए बाध्य किया। यह समर्थ गुरु रामदास का मार्गदर्शन व कृपा ही थी, जिसने शिवाजी को समय-समय पर सही सूत्र देकर आपत्ति से बचाया व श्रेयपथ पर अग्रसर किया।

गुरुगीता पाठ
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अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांज्जन शलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम:।।26।।
अर्थ
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बहुदर्शनरूप अज्ञान अन्धकार से अन्धे जीव के चक्षु सर्वात्म ज्ञान लाभ के उपाय मन्त्ररूप अंजनशलाका द्वारा जो खोल देते हैं उन श्री गुरुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ ।।26।।
26. The one who bestowes the (blind jeeva) the ignorant individual the oneness
vision in place of darkness i.e. the ignorance of multiple vision, by applying
"The Mantra form of Kajal", I offer my Salutation to that Master.

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