गुरुगीता-37
एक संत को अपना भव्य आश्रम बनाने के लिए धन की जरूरत पड़ी। वह अपने शिष्य को साथ लेकर धन जुटाने के लिए लोगों के पास गए। घूमते-घूमते वह एक गाँव में अपनी शिष्या एक बुढ़िया की कुटिया में पहुंचे।
कुटिया बहुत साधारण थी। वहां किसी तरह की सुविधा नहीं थी फिर भी रात हो गई तो संत वहीं ठहर गए। बूढी माँ ने उनके लिए खाना बनाया।
सुबह जल्दी उठकर बूढी माँ ने अपने हाथ से कुटिया की सफाई की और चिडिय़ों को दाना खिलाया। गाय को चारा दिया। फिर सूर्य को जल अर्पण किया, पौधों को सींचा। गुरु को प्रणाम किया और कुछ देर बैठ कर भगवान नाम का स्मरण। आँगन से तरक़ारी तोड़ कर भोजन पकाया। गुरु को प्रथम भोजन करवा कर आप ग्रहण किया। दिन में आस पड़ोस की बच्चियों को बुला कर उन्हें हरि कथा सुनाई, हरि भजन का ज्ञान दिया। फिर संध्या पूजन, रात को पुन: सादे भोजन का प्रबंध। सोने की तैयारी। गुरु सोचने लगे आज फिर नींद नहीं आयेगी। पूछ ही लूं कि क्या रहस्य है।
संत ने पूछा, ‘‘मां, तुमने मेरे लिए अच्छा बिछोना बिछाया। फिर भी मुझे नींद नहीं आई जबकि तुम्हें जमीन पर गहरी नींद आ गई। क्या तुम्हें धरती की कठोरता नहीं सताती? क्या यह चिंता नहीं होती कि कैसे अपने लिये अच्छे भोजन का, नरम बिछड़ने का प्रबंध करूँ? इसका कारण क्या है?’’
वह बोलीं, ‘‘गुरुदेव जब मैं सोती हूं तो मुझे पता नहीं होता कि मेरी पीठ के नीचे गद्दा है या टाट। उस समय मुझे आपके वचन अनुसार दिन भर किए गए सत्कर्मों का स्मरण करके ऐसा अद्भुत आनंद मिलता है कि मैं सुख-दुख सब भूल कर परम पिता की गोद में सो जाती हूं इसलिए मुझे गहरी नींद आती है।’’
संत ने कहा, ‘‘मैं अपने सुख के लिए धन एकत्रित करने निकला था। यहां आकर मुझे मालूम हुआ कि सच्चा सुख भव्य आश्रम में नहीं बल्कि संतोष में है, दरिद्र की इस कुटिया में है।’’
फिर उन्होंने अपना सारा एकत्रित धन गरीबों में बांट दिया और स्वयम् सामान्य-सी कुटिया में रहने लगे। एक साधारण शिष्या के माध्यम से गुरु ने ज्ञान पा लिया।
गुरुगीता पाठ
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सप्तसागरपर्यन्त तीर्थस्नानं फलं तथा ।
गुरोरंघ्रिजलाद् बिन्दु सहस्रांsशे न दुर्लभम् ।।39।।
अर्थ
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श्री गुरुदेव के पाद पद्म का एक बूँद जल जिस प्रकार दुर्लभ है, सप्तसागर पर्यन्त तीर्थ स्नान का फल उसके सहस्रांश में
भी दुर्लभ नहीं है ।।39।।
39.
A drop of the washing of the lotus feet of the Master is thousand times better as compared to the fruits of bathing at holy places of the seven seas.
COMMENTS:
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The washings of the feet of the Master are far more pious and glorious as compared to the bathings of seven seas and three and half crore holy places. The bathings of the holy places only destroy the sins but a drop of the washings of the feet of the Master delivers the aspirant from the cycle of the death and birth and merge him into the God-Existence-consciousness and Bliss.
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