सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-16
अब बारी पुरुष जेल में जाने की थी,सो हम पहुँच गये।जब वहॉ पहुँचे तो आज आफ़ताब (परिवर्तित नाम) ने औरों से झगड़ा कर लिया था, ये वही भाई था जो राखी वाले दिन ख़ूब रोया था कि मैं आपको क्या दूँ।लेकिन आज इतना भंयकर गुस्सा कि मारने तक की धमकी दे डाली।पहुँचते ही सबने शिकायतों का पिटारा खोलना शुरू कर दिया, सबके मनों में प्रशासन से शिकायत करने की बात बैठी हुई थी। जब आफ़ताब को बुलाया तो उसने पूरी बात सच-सच बताई,झगड़ा केवल खाने की बात को लेकर हुआ था, जिन बन्दी भाइयों के घर से कोई कुछ दे जाता तो उसमें से सूखा नाश्ता यज्ञ के लिए निकाल कर फिर खाने के काम में लेते थे,उसने उन लोगों के नाश्ते में से खुद भी खाया और अपने साथियों को भी खिलाया।यहीं से गाली-गलौज की शुरुआत होकर हाथापाई व मारने की धमकी देने की नौबत आ पहुँची थी। उसने बताया कि मैं यज्ञ में बैठता हूँ तो मेरे और भाई नाराज़ होते हैं कि तू क्यों करता है जबकि मैं नमाज़ में भी शामिल होता हूँ किन्तु मैं आपको बहन और सभी को अपना परिवार मानता हूँ, आपके आने से पहले सारी तैयारी मैं भी सबके साथ कराता हूँ और मुझे नहीं मालूम था कि ये कुछ खाने का निकालते हैं इसीलिए मैंने खा लिया।लेकिन इन लोगों ने गाली दी इसलिए मैंने भी इन्हें मारने की धमकी दे दी,समझाने पर उसने वादा किया कि अब ऐसा नहीं करेगा,इधर बाक़ी भाइयों को भी डॉट लगाई कि वे प्रशासन को कुछ नहीं कहेंगे।इस तरह सभी में सुलह का माहौल बन गया ।
उसे ड्राइंग बनाने का शौक था, रँगोली से अच्छी-अच्छी डिजाइन बनाता था,बाद मेंउसकोपेन्सिल ,कलर,ब्रश,कागज़ आदि लाकर दिये तो वह तरह-तरह के चित्र बनाता और जब हम पहुँचते तो सभी को दिखाता।धीरे-धीरे लड़ाई-झगड़े से दूर वह अपने शौक में
व्यस्त रहने लगा।वह लूट और मर्डर केस में आया था।जब भी कोई बात होती तो ख़ुद ही सबको बताता,मैं ख़ुदा का भी हूँ और बुतों का भी हूँ।मस्जिद और मन्दिर दोनों ही मेरे हैं और सचमुच वह नवरात्रि के दिनों में हमारे साथ रहता,तो रोज़े आने पर यज्ञ के साथियों के साथ रोज़े रखता,एक बार उसने पता नहीं कैसे अपनी बैरक में पकौड़ी बनाकर हम सभी को खिलाई,सिर्फ़ यह देखने के लिए कि हम उसे प्यार
करते हैं या नहीं। यदि हम नहीं खायेंगे तो हम झूठ बोलते हैं और छुआ-छूत मानते हैं ,और यदि उसके हाथ से बनाई पकौड़ी हमने खा ली तो हम उसे अपना मानते हैं।हमें बिना बताये हमारी परीक्षा ली गई थी,जब हम खा चुके तब ख़ुद ने ही बता दिया कि मैंने ऐसा सोच रखा था। हमने गुरुदेव-माताजी का दिल से आभार जताया कि आज आपके दिये संस्कारों की वज़ह से हम पास हो गये,और अनजाने ही उस भाई का दिल टूटने से बच गया।
क्रमशः!!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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