सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-24
आज जब पुरुष जेल पहुँचे तो गुरुदेव के प्यार का प्रत्यक्ष प्रभाव देखने को मिला, तीन गेट पार करके जैसे ही अन्दर पहुँचे तो (जो स्टॉफ यह सोचता था कि ये लोग क्या बेकार के काम कर रहे हैं, और बन्दियों से करा रहे हैं) उन्हीं में से एक सिपाही भाई बड़ी गिड़गिड़ाती आवाज़ में कहने लगा, माताजी हमारा भी कुछ कीजिए और इतना कहकर शॉति माताजी के पैर छूने लगा,लग रहा था कि बहुत परेशान है।बाद में मालूम हुआ कि उसके पिताजी की तबियत काफ़ी खराब हो गई है, इधर उसकी बेटी का रिश्ता जहाँ तय किया था, वे लोग भी दहेज के कारण रिश्ता तोड़ने पर अमादा हैं।इधर उसे प्रशासन से छुट्टी नहीं मिल पा रही है। सारी समस्याओं ने जैसे एक साथ आ घेरा हो। ड्रामा हॉल में जब यज्ञ की तैयारी के लिए पहुँचे तो कुछ बन्दी भाइयों ने कहा कि ये तो हमें कितनी बार सताया है, लेकिन हम इसके लिये जप करने को तैयार हैं, अब उन्हें औरों के लिए प्रार्थना करने में आनन्द आने लगा था।अक्सर कहते थे जीजी हम तो आजीवन कारावास की सजा में है जब गुरुजी चाहेंगे तब निकालेंगे।पर हम यदि दूसरों के लिये भी कुछ कर सकें तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है।आप सब भी तो हमारे लिए ही आते हो।हम सबने आपस में विचार-विमर्श किया तथा उस गिर्राज भाई (बदला हुआ नाम) को बुलाकर उसके पिताजी के स्वास्थ्य लाभ के लिये संकल्प 11 बन्दी भाइयों ने किया कि जब तक उसके पिताजी ठीक नहीं हो जाते, सवा महीने तक हम सभी मिलकर जप करेंगे।और इस तरह चण्डीगढ़ वालों के बाद दूसरा अनुष्ठान अन्दर के ही सिपाही भाई के लिये उठा लिया गया। सभी बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था, निश्छल प्यार और सहकार की भावना दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी जो हम सभी का हौसलाफजाई करने के लिए काफ़ी थी।हम भी ख़ुश थे कि जिस भाई को हम लोगों ने भी बर्बरता का व्यवहार करते देखा है, आज उसी के लिए ये लोग प्रार्थना का संकल्प ले रहे हैं।बहुत ही दरियादिली की बात थी यह ? कहते हैं कि अस्पताल, कारागार, पुलिस और वकीलों के पास भगवान कभी ना भेजे। लेकिन यहॉ तो सभी तरह के बन्दी भी थे,और स्टॉफ तो था ही रौबदार।
क्रमशः!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि "
👣🙏
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