अमृतवाणी-67/68/69

अमृतवाणी
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पहला शिक्षण गायत्री का यह है कि यदि मनुष्य
ऋद्धियों-सिद्धियों की ओर चलना चाहता हो तो उसे
अपने पाप और पतन का एक द्वार बन्द करना होगा
और वह है अपने अंहकार की पूर्ति की,बड्प्पन की
इच्छा।लोगों के सामने अपना चेहरा दिखाने व तालियॉ बजवाने की इच्छा।यह इच्छा यदि बनी रही
तो आदमी सिद्धान्त और आदर्श के लिये,लोकमंगल
के लिये काम नहीं करेगा।

                         परमपूज्य गुरुदेव
                  (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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गायत्री मंत्र का दूसरा शिक्षण यह है कि मनुष्य के
पास शरीर और मन की जो शक्तियॉ हैं,उन्हें वासना के द्वारा नष्ट-भ्रष्ट नहीं करना चाहिये।उन्हें संग्रहित
करना चाहिये।अपने आपको समेटना चाहिये,बिखे-
रना नहीं।ऑंख,नाक,वाणी,कान,कामेन्द्रिय आदि
अपव्यय के लिये नहीं,सदव्यय के लिये मिले हैं।अगर हम इसे देख समझ सकते हों तो हमारे जीवन
का पचास फ़ीसदी भाग जो हमारी इन्द्रियों के द्वारा
नष्ट होता चला जा रहा है,हम खोखले,निस्तेज होते
चले जा रहे हैं,वह बच सकता है।

                         परमपूज्य गुरुदेव
                 (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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तीसरा शिक्षण यह है कि हम अपने लोभ-लालच को,अपनी कामना-तृष्णा को निग्रहीत कर सकें तो
हममें से हर आदमी कबीर बन सकता है।क्या कबीर
को रोटी नहीं मिलती थी ? रैदास-मीरा,गॉधी को रोटी नहीं मिली ?और जिनको खूब मिली,उन्होंने
कोशिश की  कि रोटी के ऊपर रोटी रखकर खायें,
पर वे खा न सके।अगर उन्होंने अपनी इच्छा और
अक़्ल मोड़ दी होती लोकमंगल के लिये तो फिर वे
सरदार पटेल हो जाते,महामना मालवीय हो जाते,
देवदूत हो जाते,भगवान हो जाते।

                             परमपूज्य गुरुदेव
                     (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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