गुरुगीता-31
जिन दिनों मैं पर्वतों में निवास करता था, दिन में केवल एक ही बार भोजन किया करता था।थोड़ा सा साग, एक रोटी और एक गिलास दूध।यही मेरा भोजन था,।एक दिन मैं लगभग एक बजे हाथ पॉव धोकर भोजन करने बैठा।भगवान को अर्पित करके मैं भोजन करने ही जा रहा था कि इतने में ही गुरुदेव आ गये और बोले-रूको, मैंने कहा-क्या आज्ञा है ? गुरुदेव ने कहा, एक वृद्ध महात्मा आये हैं।उन्होंने कई दिनों से भोजन नहीं किया है।तुम अपना भोजन उन्हें दे दो,मैंने कहा-"मैं भी तो भूखा हूँ, अग़र मैं अपना भोजन उन्हें दे दूँगा तो कल तक मुझे भूखा ही रहना पड़ेगा।"
गुरुदेव बोले,'अग़र तुम एक खाना नहीं खाओगे तो मर नहीं जाओगे।इसलिए अपना भोजन उन्हें दे दो, यह मेरी आज्ञा है।किन्तु ध्यान रखो कि भोजन श्रद्धा के साथ दो, प्रेम के साथ दो, ये केवल इसलिए नहीं कि मैं तुम्हें ऐसा करने के लिए कह रहा हूँ।'
मैंने कहा, 'मैं खुद भूख से तड़प रहा हूँ और आप कह रहे हैं कि मैं उन्हें अपना भोजन दे दूँ, वह भी श्रद्धा के साथ।भला उसके प्रति मेरे भीतर कैसे श्रद्धा हो सकती है जो मेरा भोजन लेना चाहता हो'।गुरुदेव ने मुझे कई बार समझाया जब फ़िर भी मैं नहीं माना तो उन्होंने जोर देकर कहा, "मैं तुम्हें इन स्वामी जी को अपना भोजन अर्पित करने की आज्ञा देता हूँ, तुम्हें ऐसा करना ही होगा'।मैंने मन मारकर उनकी आज्ञा मान ली।वह वृद्ध महात्मा भीतर आये, उनकी दाड़ी बिलकुल सफ़ेद और लम्बी थी।उनके पास एक कम्बल, खड़ाऊं और डण्डे के अलावा कुछ भी नहीं था।वे अकेले ही पर्वतों में विचरण किया करते थे। जब वह भीतर आये तो गुरुदेव उनका स्वागत करते हुए बोले, भगवन मुझे बहुत खुशी है कि आप यहां पधारे। कृपा करके आप इस बच्चे को आशीर्वाद दीजिये।
मैंने कहा, "मुझे किसी के आशीर्वाद की जरूरत नहीं है।मुझे भोजन चाहिए, मैं भूखा हूँ"।
गुरुदेव बोले, "यदि तुम इन निर्बल क्षणों में अपना संयम खो
बैठोगे तो तुम्हें जीवनरूपी संग्राम में कभी भी विजय नहीं प्राप्त हो सकेगी।तुम प्रेम पूर्वक अपना भोजन इन स्वामीजी को अर्पित कर दो।पहले तुम जल लाओ और इनके पैर धोओ"।
गुरुदेव की आज्ञा का पालन करते हुए मैंने वैसा ही किया।किन्तु भीतर ही भीतर मैं बिलकुल भी प्रसन्न नहीं था।मैं गुरुदेव की बात को बिल्कुल नहीं समझ पा रहा था कि वे ऐसा कह क्यों रहे हैं और कर क्यों रहे हैं ? मैंने इन स्वामीजी का पादप्रक्षालन किया और गुरुदेव के कथनानुसार मैंने उनसे भोजन ग्रहण करने की प्रार्थना की।
बाद में मुझे पता चला कि स्वामी जी चार दिनों से भूखे थे ।
वृद्ध महात्मा ने भोजन किया और बोले, "भगवान तुम्हें प्रसन्न रखे।आज से तुम्हें भूख कभी भी नहीं सतायेगी।तुम्हें
भूख तभी लगेगी जब भोजन तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो।यह तुम्हें मेरा आशीर्वाद है"।
उन वृद्ध महात्मा के शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं।उस दिन से मन को व्यग्र कर देने वाली क्षुधा से, भूख से मुक्ति मिली, जो मुझे छिछोरा, बचकानापन व्यवहार करने को बाध्य कर दिया करती थी।
गुरुकॄपा केवलम्-स्वामी राम
गुरुगीता पाठ
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अनेकजन्मसंप्राप्तकर्मबन्धविदाहिने।
आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नम:।।33।।
अर्थ
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जो आत्मतत्व ज्ञान प्रदान द्वारा जीव का अनेक जन्म कृत
कर्म बन्धन का छेदन करते हैं, उन श्री गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ ।।33।।
33.
The one who annihilates the bondages of Karmas of many births by bestowing the knowledge of soul, I offer my Salutations to such a Master.
👣🙏
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