अमृतवाणी-91/92/93
अमृतवाणी
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इस बीच हमने आप से अग्निहोत्र करने का कहा,जप का एक अंश अग्निहोत्र कीजिये।आप
अग्निहोत्र को एक कर्मकांड मान बैठे हैं।अग्निहोत्र
यज्ञ-विज्ञान का नाम है।यह एक परम्परा ही नहीं,
इसका सांइन्टिफिक बेस भी है।यज्ञ कहते हैं क़ुर्बानी
को,सेवा को।भूदान यज्ञ,नेत्रदान यज्ञ,सफ़ाई यज्ञ,
ज्ञानयज्ञ हज़ारों तरह के यज्ञ हैं।इन सबका एक ही
अर्थ होता है लोक हितार्थ आहुति देना।यज्ञ कीजिये पूर्णाहुति दीजिये,पर जनकल्याण का ध्यान रखिये।
संस्कृति की रक्षा के लिये,देश और मानवी आदर्शों को जीवंत रखने के लिये अपने पसीने की आहुति
दीजिये,अपने ज्ञान की आहुति दीजिये,उस चीज़ की
भी आहुति दीजिये जिसे आपने दाबकर रखा है अपने बेटे के लिये।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य))
अमृतवाणी
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मित्रो ! अगर आप ऐय्याशी,फ़िज़ूलख़र्ची,विलासिता
की क़ुर्बानी देने की हिम्मत दिखा सकें तो यज्ञ सफल है।तब आप असली अध्यात्मवादी होंगे।जिस
दिन आप ऐसे बन जायेंगे,तब आप असली अध्यात्म
वादी होंगे।जिस दिन आप ऐसे बन जायेंगे,तब आप
देखेंगे असली चमत्कार।उस दिन आप देखेंगे असली
भगवान।तब आपको सुदामा के तरीक़े से आपके
चरणों को धोता हुआ,शबरी के तरीक़े से आपके
दरवाज़े पर झूठे बेर खाता हुआ और राजा बलि के
तरीक़े से आपके दरवाज़े पर साढ़े तीन गज ज़मीन
मॉगता हुआ,गोपियों के दरवाज़े पर छाछ मॉगता
हुआ आपको भगवान दिखाई पड़ेगा।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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देवियो ! भाइयों !
बहुत पुराने समय की बात है,जब रावण सीताजी को चुराकर ले गया था और सबके सामने
यह समस्या थी कि कि मुक़ाबला कैसे किया जाये?
रावण से युद्ध कैसे किया जाये ? बहुत सारे लोग थे,
राजा महाराजा भी थे,पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ी
कि रावण से लड़ने के लिये जाये,कौन अपनी जान
गँवाये,कौन मुसीबत में फँसे ? इसलिये कोई भी तैयार नहीं हुआ।रामचन्द्र जी कहने लगे कि क्या कोई भी लड़ने हमारे साथ नहीं जायेगा ? तो फिर क्या हुआ।देवताओं ने विचार किया और कहा कि भगवान के काम में हमको सहायता करनी चाहिये
और सुग्रीव की सेना में,हनुमान की सेना में सम्मिलित होकर रावण से लड़ने के लिये चलना
चाहिये।देवताओं ने बन्दर का रूप बनाया,रीछ का रूप बनाया।कहॉ रावण और कहॉ बेचारे बन्दर,दोनों का कोई मुक़ाबला नहीं था,फिर भी वे लड़ने के लिये चल पड़े,क्यों ? क्यों कि वे देवता थे।देवता न होते,अगर रीछ-बन्दर रहे होते तो पेड़ों पर कुदक रहे
होते,फिर वे सीताजी को छुड़ाने के लिये,रामराज्य की स्थापना के लिये, लंका को तहस-नहस करने के लिये भला इस तरह के कार्य कैसे कर सकते थे?
लेकिन उन्होंने किया ।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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