अमृतवाणी-142/143/144
मुसलमान भी प्रतीकों को नहीं मानते हैं क्या?मक्का-मदीना में प्रतीक ही तो रखा हुआ है जिसका वे चुम्बन लेते हैं।समस्त देवात्मा हिमालय का मन्दिर कहीं था नहीं।भारतवर्ष का यह एक बड़ा अभाव था।वह हमने दूर किया है, ताकि साधना की दृष्टि से कोई आदमी आना चाहे
तो इस स्थान पर आकर वह महत्वपूर्ण लाभ उठा सके।इसलिए यह बनाया गया है।मुनासिब जगह पर मुनासिब काम होते हैं।हिमालय में बहुत सारे ॠषि रहते हैं और जो भी ॠषि आये हैं, वे सब हिमालय से आये हैं।उन्हीं ॠषियों का स्मरण दिलाने के लिए हमने यह कोशिश की है कि जो उन्होंने काम किये थे, उनको समेट करके पूरा न सही, थोड़ा-थोड़ा काम करें तो अच्छा होगा।हमने वही किया है ।
व्यास जी ने अठारह पुराण लिखे थे।दर्शन भी लिखे थे। पुराणों और दर्शनों को हम लिख तो नहीं सके, पर हमने उनका अनुवाद किया है।वेदों का अनुवाद किया है। व्यास जी ने जो काम किये थे, उस रास्ते पर हम भी चले हैं और यहाँ जब शांतिकुंज में आयेंगे तो देखेंगे कि उसकी निशानी यहॉ भी विद्यमान है।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
महर्षि पतंजलि ने गुप्तकाशी में रहकर योगाभ्यास किया था ।आप जब आयेंगे तो देखेंगे कि यहॉ जो कल्प-साधना शिविर कराये जाते हैं, अन्य दूसरे शिविर कराये जाते हैं और यहाँ योगाभ्यासों का,प्राणायामों का विधि-विधान सिखाया जाता है, वह हमने भी किया है और आपको भी सिखाते हैं।पुराने जमाने के ॠषियों में याज्ञवल्क्य का महत्वपूर्ण स्थान है।उन्होंने यज्ञ के संबंध में शोध की थी।यज्ञ से किस तरीके से मनुष्य के शारीरिक और मानसिक रोगों का निराकरण होना संभव है।ऐसी बहुत सी बातों की महत्ता थी तब, लेकिन लोग उस महत्वपूर्ण यज्ञ को भूल-भाल गये थे।ऐसे ही हवन कर लेते थे सुगंध फैलाने के लिये।हमने उसको फिर से जीवित किया है।शोध करके जैसे कि याज्ञवल्क्य ॠषि ने किया था।लगभग उसी तरीके से यहाँ शांतिकुंज में भी हमने कोशिश की है कि वह परम्परा चलती रहे।
विश्वामित्र ॠषि थे। वे गायत्री के मंत्र दृष्टा थे।गायत्री मंत्र जो हम बोलते हैं, उसका विनियोग है, सविता देवता है और विश्वामित्र ॠषि। गायत्री छन्द विनियोग है।विश्वामित्र उसके पारंगत थे।विश्वामित्र का भी यहॉ स्थान बना हुआ है शान्तिकुन्ज में।हमने भी गायत्री के पुरश्चरण किये हैं।विश्वामित्र को भी हम गुरु मानते हैं, जो हमारे हिमालय वाले गुरु हैं, वे अगर विश्वामित्र हों तो आप अचम्भा मत मानना ।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
भागीरथ भी नाम आपने सुना होगा।उन्होंने हिमालय पर तप किया था और तप करके ज्ञान गंगा को लाये थे।गंगा जब धरती पर आने लगीं तो उनके प्रचण्ड वेग को देखकर भागीरथ ने सोचा कि यह तो हमारे बूते का नहीं है।गंगा जी ने भी कहा कि जब मैं नीचे जमीन पर गिरूँगी तो सूराख हो जायेगा।सो तुम मुझे स्वर्ग से बुलाकर कैसे धारण करोगे ?तब भागीरथ ने शंकर जी से मदद मॉगी।शंकर जी ने अपनी जटायें फ़ैला दीं।इस तरह स्वर्ग से जब गंगा आईं थीं तो पहले शंकर जी की जटाओं में आईं, पीछे ज़मीन पर गिरीं।
भागीरथ आगे-आगे चले इसलिए गंगा भागीरथी कहलाईं, यह आपको मालूम है न ? भागीरथ तो अब नहीं हैं,मग़र उनके तप का स्थान अभी भी है।गंगोत्री के पास गौरीकुण्ड है, उसके पास एक शिला है, जिसका नाम भागीरथ शिला है, जहाँ भागीरथ ने बैठकर तप किया था।उस स्थान पर बैठकर हमने भी ठीक उसी तरीके से एक साल का अनुष्ठान किया था।हम भी ज्ञान- गंगा को लाये हैं।यह ॠषियों की परम्परा है।हमने कोशिश की है कि ॠषिगण जिस रास्ते पर चले हैं, हम भी उस रास्ते पर चलें।ॠषियों की वज़ह से हिमालय धन्य हुआ, नहीं तो हिमालय में क्या बात है ? इससे ऊँचे-ऊँचे और भी पहाड़ हैं।सारी दुनिया में पहाड़ों की कोई कमी है क्या ? उत्तराखंड इसी वज़ह से प्रख्यात हुआ है कि इसमें चारों धाम भी बने हैं।पॉच प्रयाग भी इसमें हैं।पॉच गुप्तकाशियॉ भी हैं।पॉच सरोवर भी हैं।समूचे भारत वर्ष के जो कुछ भी महत्वपूर्ण स्थान हैं, जो कुछ भी तीर्थ हैं, सब इकट्ठे होकर इसी जगह पर एकत्रित हो गये हैं।हमारा भी प्रयत्न इसी तरीके से रहा है।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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