गुरुगीता-13
गुरुगीता -12
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कृष्णभक्ति शाखा की हिंदी की महान कवयित्री मीराबाई का जन्म संवत् १५७३ में जोधपुर में चोकड़ी नामक गाँव में हुआ था। इनका विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी के साथ हुआ था। ये बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं।
विवाह के थोड़े ही दिन के बाद आपके पति का स्वर्गवास हो गया था। पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन- प्रति- दिन बढ़ती गई। ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं।
मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गईं। वह जहाँ जाती थीं, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। लोग आपको देवियों के जैसा प्यार और सम्मान देते थे। इसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को पत्र लिखा था :-
"स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई।
बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।।
घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।
साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।
मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।"
मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसी दास ने इस प्रकार दिया:-
जाके प्रिय न राम बैदेही।
सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेहा।।
नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ।
अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ।।
मीराबाई रैदास को अपना गुरु मानते हुये कहतीं हैं----
"गुरु मिलिया रैदास दीनी ज्ञान की गुटकी"
गुरुगीता पाठ-
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गुरुवक्त्रे स्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादत:।
स्वाश्रमोक्तं स्वजातिं च स्वकीर्तिं पुष्टवर्धिनीम।
अन्यत् सर्वं परित्यज्य गुरोरन्यं न भावयेत ।।15।।
अन्वयः -
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ब्रह्म - ब्रह्म तत्व, गुरु वक्त्रे - गुरु के मुख से, स्थितिमे - अवस्थित, तत् - उनके, प्रसादत: - प्रसाद से, प्राप्यते - शिष्य लाभ करते हैं, स्वाश्रमोक्तं - अपने-अपने,आश्रम विहित,स्वजातिम् - स्वजाति,च - भी, स्वकीर्तिम् - अपनी कीर्ति, पुष्टिवर्धिनीम् - पुष्टिकारक ,अन्यत् - अन्य, सर्वम् -
सब,परित्यज्य - परित्याग कर,गुरो: - गुरु से, अन्यम् - भिन्न, न भावयेत - भावना नहीं करे।।15।।
अर्थ -
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ब्रह्मतत्व गुरु के मुख से सुनने पर ही स्पष्ट होता है, क्यों कि
गुरुमुख में ब्रह्मतत्व अवस्थित है।गुरु के प्रसाद से शिष्य वह
तत्व लाभ करने में सफल होते हैं।अपना-अपना आश्रमविहित धर्म, स्वजाति पुष्ट करने वाले कर्म, अपनी कीर्ति और अन्य सब चिन्ता त्याग कर गुरु से भिन्न और कोई चिन्तन न करे।एक मात्र गुरु की भावना करें ।।15।।
।।15।।
15. The knowledge about Brahma is realised clearly only when it is obtained from the Master because the Brahma knowledge is poised in the words of the Master The aspirant attains the Brahma Tatva successfully because of grace Guru Prasad. One should leave all worries about carrying out day to day religious practices as ordained in the particular status (Asharam-student, Householder Vanprasthas, Sanyasi) and activities for the benefit of one's own caste, about one's name and fame and others. The piritual person should not worry about anything except the Master. It means he should only think of the Master alone. nd The object of pure contemplation will be the Master and one should not contemplate of any other temporal object including one's own self.
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