अमृतवाणी-40/41/42
अमृतवाणी
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समस्यायें आदमी के सड़े हुये दिमाग़ में से पैदा होती
हैं,सड़े हुये दिल से पैदा होती हैं।पैसे वाले बड़ी-बड़ी
योजनायें बनाते हैं कि हम गृह-उद्योग बढ़ायेंगे,नहरें
खोदेंगे,बॉध बनायेंगे,ये सब ठीक है।आदमी को साक्षर बनायेंगे,हर आदमी को मालदार बनायेंगे।कोई कहता है कि आदमी को पहलवान बनायेंगे,
पर इतना सब करने के बाद फिर होगा क्या ? ज़रा
विश्लेषण,पोस्टमार्टम करके देखिये कि इस सबके
बाबजूद विचारों की,दर्शन की भ्रष्टता यदि बनी रही
तो वह करता क्या है ? वह ख़ुद जलता है,दूसरों को
जलाता है। दियासलाई अपने आपको जला के ख़त्म कर देती है,दूसरों को जला देती है। आज हमारी जिन्दगियॉ दियासलाइयों के तरीक़े से जल रहीं हैं और अनेक को जला रही हैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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आज सारा समाज जिस तरीक़े से भ्रष्ट-चिन्तन व
दुष्ट आचरण करता चला जा रहा है इस सबका मूल कहीं खोजना हो तो एक ही जगह है,वह है आदमी के सोचने व ऊँचा उठाने वाली शैली,तरीक़ा,
विद्या जिसे “दर्शन”कहते हैं।सुकरात ने अपने समय
में अपने समाज को एक ही दिशा देना शुरु किया,
जिसका नाम था “दर्शन”।विचार नहीं ।विचार तो
अख़बारों में,गन्दी किताबों में रोज़ छपते रहते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमृतवाणी
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सुकरात का दर्शन जिन दिनों पैदा होने लगा और विद्यार्थियों को पढ़ाया जाने लगा तो हुकूमत कॉप
उठी।हुकुम दिया गया कि यह आदमी बाग़ी है।इस आदमी को ज़हर पिला देना चाहिये।डाकू-चोर एक या दो पूरे समाज को हिलाकर रख देता है।दार्शनिक
दुनिया को उलट-पलट देता है।ईसा सन्त थे,नहीं
दार्शनिक थे।सन्त तो समाज में ढेर सारे हैं,जो एक पॉव पर खड़े रहते हैं,पानी नहीं पीते,दूध नहीं पीते।बाबाजी का बात नहीं कह रहा मैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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