गुरुगीता-11

समर्थ गुरु श्री रामदास जी के बचपन का नाम नारायण था | वह गंगाराम पंत के छोटे भाई थे | नारायण का जन्म  सन १६०८ इसवी मे चैत्र शुदी नवमी को सूर्य पंत और रानुदेवी के घर मे हुआ था | यही तिथि श्री राम के जन्म दिन की थी | इस लिये आपका नाम रामदास रखा गया | रामदास का मन औपचारिक पीड़ी  में नही लगता था | उन्हे तो तालाब में तैरना पेड़ पर चढ़ना और इसी प्रकार की अन्य शैतानियां करना पसंद था | आपके सामने जो भी बोला जाता था वो आप  तुरंत याद कर लेते थे | नारायण का मन वैराग्य से भरा  हुआ था | नारायण की माँ रामदेवी नारायण की अवस्था देख-देख  कर बहुत चिंतित थी |
उन्होने उनका विवाह कर देने का सोचा जिससे उनका ध्यान बदल जायेगा तथा इस दिशा मे प्रयत्न करने शुरू कर दिये विवाह की तयारी होने लगी, बारात लड़की वालों के घर 'आसन ' गौण मे पहुच गयी | पुरोहित जी मंत्र पाठ करने लगे और पाठ के अंत मे "शुभम लग्नम सावधानं भव" सावधान शब्द पड़ते ही वह वहाँ से भाग खडे  हुये । देखते ही देखते नारायण जी लापता हो गये, किसी प्रकार छुपते-छुपाते नासिक पहुचे और गोदावरी के तट पर पचवटी मे बनी एक गुफा मे बैठ कर समाधी लगा ली | नारायण वहा पर १२ वर्ष तक रहे | गोदावरी के पानी मे खडे होकर वह घंटो श्री राम का ध्यान करते | एक बार आपने १३ लाख बार पानी मे खडे होकर इस मंत्र का जाप किया, श्री राम जय राम जय जय राम मंत्र का जाप करने की समाप्ति पर ही, श्री राम साक्षात उनके सामने प्रकट हुये | वह हमेशा कहते थे "जय जय रघुवीर  समर्थ" | इसलिये लोग आपको समर्थ गुरु रामदास कहने लगे |
देश भर मे प्राय ६०० से भी अधिक मंदिरों का निर्माण करवाया | माघ की नवमी को वह ब्रह्मलीन हो गये |  समर्थ गुरु रामदास जी ने बाल्मीकि की पूरी रामायण अपने हाथ से लिखी | यह पाण्डुलिपि आज भी धुबलिया के श्री एस एस देव के संग्रलाय में सुरक्षित है | रामदास जी के हजारों शिष्यों छत्रपति शिवाजी और अम्बा जी उनकी हर प्रकार से सेवा करते और उनके वचनों को कलमबद्ध करते - एक सच्ची घटना ->
एक धनी व्यक्ति श्री अग्निहोत्री की मृत्यु हो गयी अग्निहोत्री जी की पत्नी ने सती होने का प्राण लिया था | अत: वह समस्त अआभूषणों से सुसजित अपने पति की चिता पर अपने को बलिदान करने जा रही थी | तभी एक संत उधर से गुजरे और बिना शव को देखे उस महिला के प्रणाम  करने पर उसको आशीर्वाद दे डाला "अस्तापुत्र सौभाग्यवती भव " उसने रोते-रोते संत को उधर शव की और देखने का संकेत किया। संत ने पास की बह रही गोदावरी नदी से चुल्लू भर पानी लिया और ईश्वर से प्रार्थना  करते हुई वह जल शव पर झिड़क दिया मुर्दे में जान आ गयी और अग्निहोत्री जी उठ गये  | यह संत और कोई नहीं, शिवाजी के गुरु समर्थ स्वामी रामदास जी थे |
छत्रपति शिवाजी और रामदास स्वामी पहली बार १६७४ में मिले शिवाजी ने रामदास स्वामी को अपना धार्मिक गुरु माना है|
समर्थ  गुरु रामदास जी ने अपना समस्त जीवन रास्ट्र को अर्पित कर दिया |

गुरुगीता पाठ
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काशीक्षेत्रंनिवासोsसौ जान्हवीचरणोदकम् ।
गुरुर्विश्वेश्वर: साक्षात् तारकं ब्रह्म निश्चितम् ।।13।।
अन्वयः-
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अस्य  - इसका, निवास: - वास स्थान, काशी क्षेत्रम्  - काशी क्षेत्र, जाह्नवी  - गंगा, चरणोदकम्  - चरणोदक, गुरु: - गुरु, साक्षात्  - साक्षात, विश्वेश्वर: - विश्वेश्वर, निश्चितम्  - निश्चित, तारकम्  - तारक, ब्रह्म, सच्चिदानंद घन परमात्मा ।।13।।
अर्थ  -
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श्री गुरुदेव का निवासस्थान ही काशी क्षेत्र स्वरूप है, उनका चरणोदक जाह्नवी के जल के सदृश है, गुरु साक्षात विश्वेश्वर हैं और निश्चय ही संसार भवत्राता सच्चिदानन्द घन परमात्मा हैं ।।13।।
13.
The abode of the Master is Varanasi (Kashi) itself, the washing of the feet of the Master are like the waters of the Ganges, the Master himself is practically the Lord of the Universe and is definitely the one who protects and safely carries you during the so-journ across this world. The Master is dense consciousness, existence and bliss and is the Supreme soul.

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