अमृतवाणी-49/50/51

अमृतवाणी
————
ऋत उसे कहते हैं,जिसमें आदमी का चिन्तन और जीवन देवोपम बन जाता है।वह अपने कर्तव्यों का
निर्धारण करता है।क्या निर्धारण करता है ? “वयं
राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:।” हम पुरोहित अर्थात् हम
ब्राह्मण,हम सन्त,हम ऋषि यह उत्तरदायित्व ग्रहण
करते हैं और यह घोषणा करते हैं कि ‘वयं’ अर्थात्
हम सब, ‘राष्ट्रे’ सारे राष्ट् को,नागरिकों को,विश्व मानवता को ‘जागृयाम’ जीवन्त और जागृत रखे रहेंगे । जीवन्त और जागृत रखने की ज़िम्मेदारी केवल एक ही वर्ग के लोगों की है,जिनका नाम है-
ब्राह्मण ।

                              परमपूज्य गुरुदेव
                     (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
———-
दूसरा वाला अनुदान दूसरी श्रेणी के लोगों को मिलता है।उसका नाम है-शौर्य और साहस।तीसरा
अनुदान है-साधन और चौथे का नाम है-श्रम।वर्णाश्रम व्यवस्था के हिसाब से यही चार प्रकार के
वर्गीकरण हैं।भगवान के अनुदान एक के बाद एक
मिलते हैं,जिनके हिस्से में पराक्रम है,शौर्य है,साहस है,हिम्मत है,वे दुनिया में अपने तरीक़े से काम करते हैं। कोलम्बस के तरीक़े से,नैपोलियन के तरीक़े से,
भौतिक दुनिया में बहुत काम कर जाते हैं और आध्यात्मिक जगत में फरहाद से लेकर मीरा तक व
विवेकानंद से लेकर दयानन्द तक जाने क्या से क्या
कर डालते हैं।

                           परमपूज्य गुरुदेव
                   (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
————
ये ग़ज़ब कर देने वाले प्राणी साहसी कहलाते हैं।साहसी को क्षत्रिय कहते हैं।तीसरे वर्ग के पास सम्पदायें रहती हैं और चौथा वर्ग श्रमिक जो अपने
पसीने से,अपनी मेहनत-मशक़्क़त से दुनिया को ख़ुशहाल बना सकते हैं।ताक़त दूसरे प्राणियों में भी
है,पर वे श्रम नहीं कर सकते।नियोजित श्रम उनके
पास नहीं है।हाथी के पास,घोड़े के पास ताक़त है,
पर वह उस ताक़त का उपयोग नहीं कर पाता।पर
इन्सान अपनी ताक़त का जानकार है,उसका उपयोग
कर सकता है और यह भगवान का अनुदान है और
इसी से यह साधन पाता है।

                        परमपूज्य गुरुदेव
                (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुछ यूं है तेर शुकराना-429

शुकराना -424

याद आपकी-428