गुरुगीता-27
शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु हैं। ये भृगु ऋषि तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या के पुत्र हैं। इनका जन्म का नाम शुक्र उशनस है। इन्हें भगवान शिव ने मृत संजीवन विद्या का ज्ञान दिया था, जिसके बल पर यह मृत दैत्यों को पुन: जीवित कर देते थे।भगवान वामन ने फोड़ी थी एक आंख ?
ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने वामनावतार में जब राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी तब शुक्राचार्य सूक्ष्म रूप में बलि के कमंडल में जाकर बैठ गए, जिससे की पानी बाहर न आए और बलि भूमि दान का संकल्प न ले सकें। तब वामन भगवान ने बलि के कमंडल में एक तिनका डाला, जिससे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई। इसलिए इन्हें एकाक्ष यानी एक आंख वाला भी कहा जाता है।
गुरुगीता पाठ
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चिन्मयं व्यापितं सर्वं त्रैलोक्यं सचरारम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नम ।।29।।
अर्थ
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जो चिन्मयरूप से समस्त त्रिभुवन में व्याप्त हैं उस परम सूक्ष्मरूप के दर्शन जिन्होंने कराये हैं उन श्री गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ ।।29।।
29. The one who makes us realise the extremely subtle conscious form of God permeating the three spheres I offer my salutation to that Master .
Just as in a rosary the individual beads are chained by thread, but the thread is not visible, similarly, the gross effect form of three spheres is visible but the causal state of the soul cannot be visualized by the physical eyes. The one who bestowes the benediction of the above divine vision, I offer my salutation to that Master.
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