सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-23
सुमन कँवर के पति को एक-दो बार और देखने गये अस्पताल में। जितना संभव था, प्रशासन के दायरे में रहकर उतना सहायता किया।उसके बाद महिला जेल में जब गये तो सुमन को सारी ख़बर दी उसके पति की,उसे समझाया कि चिन्ता की कोई बात नहीं।जिन बहनों ने मंत्र लेखन की कापियां भर दी थीं, उनसे कापियां वापस ली तथा गुरुदेव के साहित्य से एक पाठ उन्हें सुनाकर विस्तार से समझाने के बाद यहाँ भी सवाल-जवाब का महौल चलता हॉलाकि बहनें सरलता से पूछतीं, भाइयों की तरह परेशान करने वाला भाव उनका नहीं होता था।वैसे भी भाई लोग परेशानी में भी जल्दी ही अपने आपको सँभाल लेते हैं, लेकिन बहनें भीतर और बाहर भी हर वक्त घुटती ही रहती हैं, दूसरा कारण एक दूसरे से ईर्ष्या रखने का भाव आपस में मन भी हल्का नहीं करने देता। ऐसा नहीं कि भाइयों में ईर्ष्या नहीं होती लेकिन उनका तरीका कुछ अलग होता है।यज्ञ करते समय सुमन के पति के स्वास्थ्य लाभ के लिये भी आहुतियां डाली गईं।अब सबको बहुत अच्छा लगने लगा था।जिस-जिस को भी अपने गॉव में किसी के भी बीमार होने की खबर मिलती तो वे यज्ञ का इन्तज़ार करने लगतीं।पहुँचने पर तुरंत ही बताती कि आज किसके स्वास्थ्य लाभ के लिये आहुतियां डालनी हैं।फिर खुशी-खुशी तैयारी में जुट जातीं। जप का भाव यहाँ भी बढ़ने लगा, होड़ रहती कि किसने कितनी माला का जप किया। लेकिन आपस में प्यार का थोड़ा अभाव था, यह भी कैसे पता लगा कि सुमन के पति के लिए (उसके पैर का बड़ा ऑपरेशन होना था)ज्यादा नहीं सिर्फ़ 3 माला प्रत्येक बहन को करने को कहा गया, तो 20 बहनों में से केवल 5-7 बहनें ही तैयार हुईं बाक़ी ने मना कर दिया। हम अपने लिए करेंगे औरों के लिए क्यों करें ? अभी उन पर ज्यादा दबाव नहीं बनाया जा सकता था। यहां पर रूठ जाना, इसको प्यार ज्यादा करते हैं, उसको कम करते हैं।अभी सोच को बहुत बदलना था,क्यों कि अभी तक वे पक्षपात ही देखती आ रहीं थीं,पहले से ही। धीरे-धीरे धैर्य के साथ ही काम लेना था यहाँ पर भी ।
क्रमशः !
'गुरुकॄपा केवलम्'
(गुरुवर शरणम् गच्छामि)
👣🙏
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